देश में अभी पेट्रोल-डीजल की कीमतें भले ही स्थिर नजर आ रही हों, लेकिन इसके पीछे बड़ी कहानी छिपी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लगातार महंगा हो रहा है, जबकि देश में दाम लंबे समय से नहीं बढ़े हैं। इसका सीधा असर तेल कंपनियों पर पड़ रहा है, जो हर दिन भारी नुकसान झेल रही हैं। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अगर यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में पेट्रोल ₹18 और डीजल ₹35 तक महंगा हो सकता है। खास बात यह है कि पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में चुनाव खत्म होने के बाद कीमतों में बदलाव देखने को मिल सकता है।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सबसे बड़ा असर तेल कंपनियों पर पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों को पेट्रोल पर करीब ₹18 और डीजल पर ₹35 प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। कुछ समय पहले यह नुकसान और ज्यादा था, जब कंपनियां रोज करीब ₹2400 करोड़ तक घाटा झेल रही थीं। हालांकि एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बाद यह नुकसान घटकर करीब ₹1600 करोड़ प्रतिदिन रह गया है। फिर भी यह आंकड़ा काफी बड़ा है और लंबे समय तक इसे झेलना आसान नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रहा है। आमतौर पर जब क्रूड ऑयल महंगा होता है, तो पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ जाते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। देश में कीमतें स्थिर रखी गई हैं, जिससे कंपनियों का घाटा बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी पर कंपनियों का नुकसान करीब ₹6 प्रति लीटर तक बढ़ जाता है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि अभी कीमतों को इसलिए स्थिर रखा गया है क्योंकि कई राज्यों में चुनाव चल रहे हैं। पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में चुनाव खत्म होने के बाद कंपनियां कीमतों में बढ़ोतरी कर सकती हैं। अगर ऐसा होता है, तो आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा और रोजमर्रा का खर्च बढ़ सकता है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसमें से करीब 45% मिडिल ईस्ट और 35% रूस से आता है। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला हर बदलाव सीधे भारत को प्रभावित करता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर डालती हैं। इससे चालू खाता घाटा बढ़ने का खतरा भी बना रहता है।
बीते कुछ सालों में सरकार ने तेल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी में भी कमी की है। जहां पहले यह हिस्सा सरकारी राजस्व का करीब 22% था, अब घटकर लगभग 8% रह गया है। हालांकि, अगर सरकार पूरी ड्यूटी भी हटा दे, तब भी कंपनियों का मौजूदा नुकसान पूरी तरह खत्म नहीं होगा।
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भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीजल पहले ही महंगे हो चुके हैं। अमेरिका में पेट्रोल की कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन के पार पहुंच गई है। वहीं पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों में भी दाम बढ़ाए जा चुके हैं। इससे साफ है कि यह समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है।
पहले पेट्रोल-डीजल की कीमत सरकार तय करती थी, लेकिन अब यह जिम्मेदारी तेल कंपनियों के पास है। कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत, डॉलर-रुपया एक्सचेंज रेट, टैक्स और ट्रांसपोर्टेशन लागत को ध्यान में रखते हुए रोजाना कीमत तय करती हैं। यही वजह है कि कभी-कभी कीमतों में अचानक बदलाव देखने को मिलता है।