देश में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, राजनीतिक दलों के बीच जनता को लुभाने की होड़ भी तेज होती जा रही है। इस बार चुनावी मैदान में सबसे बड़ा हथियार बनकर उभरी हैं महिलाओं के खाते में सीधे नकद राशि ट्रांसफर करने वाली योजनाएं। आने वाले चुनावों वाले राज्यों में से चार राज्यों-तमिलनाडु, असम, केरल और पश्चिम बंगाल ने इस रणनीति पर खुलकर दांव लगाया है।
इन राज्यों की सरकारें मिलकर करीब 24,500 करोड़ रुपए महिलाओं के खातों में ट्रांसफर कर रही हैं। यह सिर्फ मौजूदा योजना नहीं, बल्कि चुनावी वादा भी है कि अगर सत्ता में वापसी होती है, तो अगले पांच साल तक यह आर्थिक सहायता जारी रहेगी। इससे साफ है कि महिला वोटर्स को साधने की यह रणनीति अब राजनीति का अहम हिस्सा बन चुकी है।
दक्षिण भारत के तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम सरकार ने महिलाओं को ‘स्पेशल समर पैकेज’ के तहत 2,000 रुपए सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर किए हैं। इस कदम को महंगाई और गर्मी के मौसम में राहत देने के तौर पर पेश किया गया है। साथ ही यह चुनावी रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है, जिससे महिला मतदाताओं में सरकार के प्रति सकारात्मक माहौल बनाया जा सके।
पूर्वोत्तर के अयम में भारतीय भारतीय जनता पार्टी सरकार ने बिहू त्योहार के मौके पर महिलाओं को 4,000 रुपए का बोनस दिया है। यह पहल सांस्कृतिक भावना के साथ-साथ आर्थिक सहयोग का भी संदेश देती है। सरकार का उद्देश्य त्योहार के समय लोगों को राहत देना और साथ ही महिला वोटर्स को अपने पक्ष में मजबूत करना है।
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केरल की वामपंथी सरकार ने ‘स्त्री सुखम’ योजना के तहत करीब 10 लाख महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपए देने की व्यवस्था की है। यह योजना लगातार आर्थिक सहायता प्रदान करने के मॉडल पर आधारित है, जिससे महिलाओं को नियमित आय का स्रोत मिल सके। इस तरह की योजनाएं लंबी अवधि में राजनीतिक समर्थन बनाए रखने का मजबूत जरिया बन रही हैं।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के तहत पहले से मिल रही राशि में 500 रुपए की बढ़ोतरी की है। यह योजना पहले ही 2021 के चुनाव में बड़ा गेमचेंजर साबित हो चुकी है। हालांकि, राज्य की आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह योजना सरकार पर भारी वित्तीय दबाव भी डाल रही है। अनुमान है कि अगले साल इस योजना पर करीब 5,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
चारों राज्यों में इन योजनाओं से लाभान्वित होने वाली महिलाओं की संख्या करीब 4.1 करोड़ है, जबकि कुल मतदाता 17.89 करोड़ हैं। यानी लगभग 23% वोटर्स सीधे इन नकद योजनाओं से जुड़े हुए हैं। यह आंकड़ा दिखाता है कि चुनावी रणनीति में महिलाओं को केंद्र में रखकर योजनाएं बनाई जा रही हैं।
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पिछले पांच वर्षों के चुनावी ट्रेंड पर नजर डालें तो साफ होता है कि महिलाओं को नकद सहायता देने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। पहले जहां यह मॉडल केवल एक-दो राज्यों तक सीमित था, वहीं अब यह बढ़कर 15 राज्यों तक पहुंच चुका है। इन राज्यों में 13 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को हर साल लगभग 2.46 लाख करोड़ रुपए तक की नकद सहायता दी जा रही है। यह राशि इन राज्यों के कुल बजट का करीब 0.7% हिस्सा है।
हालांकि ये योजनाएं राजनीतिक रूप से प्रभावी साबित हो रही हैं, लेकिन इनका आर्थिक असर भी सामने आने लगा है। कुछ राज्यों में नकद योजनाओं पर ज्यादा खर्च होने के कारण अन्य विकास योजनाओं पर असर पड़ रहा है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों को अपने बजट में कटौती करनी पड़ी है। वहीं झारखंड जैसे राज्य अपने ग्रामीण विकास बजट का बड़ा हिस्सा नकद ट्रांसफर पर खर्च कर रहे हैं।
विकासशील समाज अध्ययन पीठ के डायरेक्टर प्रो. संजय कुमार के अनुसार अलग-अलग विचारधारा की पार्टियां चुनाव जीतने के लिए एक ही फॉर्मूला लगा रहीं हैं। जबकि सच्चाई यह है कि केवल इससे रिजल्ट नहीं बदले जा सकते। वाईएसआर कांग्रेस की सत्ताधारी पार्टी बंगाल के बाहर किसी राज्य में कैश ट्रांसफर देने वाली दूसरी सरकार थी। वो उन माताओं को भी कैश ट्रांसफर देती थी, जिनके बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं। इसके बाद भी वो चुनाव हारी। राजस्थान में इंदिरा महिला सम्मान योजना भी कांग्रेस की सरकार नहीं बचा पाया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई राज्यों में ऐसी योजनाएं लागू होने के बावजूद सरकारें चुनाव हार चुकी हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मतदाता सिर्फ आर्थिक लाभ ही नहीं, बल्कि अन्य मुद्दों को भी महत्व देते हैं।
कुछ राज्यों में ये योजनाएं चुनावी परिणामों को प्रभावित करने में सफल भी रही हैं:
इन योजनाओं ने महिला वोटर्स को प्रभावित कर राजनीतिक दलों को बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
नकद ट्रांसफर के अलावा कई राज्यों में अन्य मुफ्त योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। तमिलनाडु में मुफ्त फ्रिज, एजुकेशन लोन माफी और गैस सिलेंडर जैसी योजनाएं लागू हैं। केरल में पेंशन योजना के तहत 62 लाख लोगों को लाभ मिल रहा है, जिसमें राशि भी बढ़ाई गई है। पश्चिम बंगाल में बेरोजगार युवाओं के लिए पेंशन योजना पर भारी खर्च किया जा रहा है।