भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने सामाजिक सद्भाव को मौजूदा जरूरत बताते हुए कहा कि यह कोई नई अवधारणा नहीं बल्कि हमारे समाज का स्वभाव रहा है। जनजातीय और अन्य वर्गों में भ्रम फैलाकर तोड़ने के प्रयास हुए लेकिन यह भी सच है कि हजारों वर्षों से अखंड भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक है।

भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक में विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों ने अपने कार्यों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि आज समाज में सज्जन शक्ति का जागरण, आचरण में पंच परिवर्तन और निरंतर सद्भावना संवाद आज की आवश्यकता है। मिलना, संवाद करना और एक-दूसरे के कार्यों को जानना ही सद्भावना की पहली शर्त है।
भागवत ने दोहराया कि हिंदू कोई संज्ञा नहीं, बल्कि एक स्वभाव है, जो मत, पूजा पद्धति या जीवनशैली के आधार पर झगड़ा नहीं करता। कानून समाज को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन समाज को चलाने और जोड़कर रखने का कार्य सद्भावना ही करती है। विविधता के बावजूद एकता ही हमारी पहचान है।
कार्यक्रम के पहले सत्र में कथावाचक पं. प्रदीप मिश्रा ने कहा कि सभी समाज अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं, लेकिन यह प्रश्न भी आवश्यक है कि हमने राष्ट्र के लिए क्या किया और राष्ट्र को क्या दिया। संघ और शिव के भाव में अद्भुत समानता है। जैसे शिव ने समस्त सृष्टि के लिए विष पिया, वैसे ही संघ प्रतिदिन आरोपों का विष पीकर भी संयम और राष्ट्रहित में कार्य करता है।
पं.मिश्रा ने ‘ग्रीन महाशिवरात्रि’ जैसे अभियानों का उल्लेख किया। घर-घर मिट्टी के शिवलिंग की पूजा सामाजिक समरसता का सशक्त उदाहरण बताया। बोले- जैसे लंगर में जाति नहीं पूछी जाती, वैसे ही राष्ट्र निर्माण के लिए सभी को एकजुट होकर कार्य करना चाहिए।
कार्यक्रम में मीणा समाज के रामनिवास रावत, जाटव समाज-रामावतार मौर्य, माहेश्वरी समाज-रंजना माहेश्वरी, राजपूत महापंचायत- अभय परमार और भार्गव समाज के मयंक भार्गव ने शिक्षा-स्वास्थ्य व गोंडी भाषा संरक्षण की चर्चा की। केशव पांडे ने कला-संस्कृति और नदी पुनर्जीवन और अमित रघुवंशी ने शिक्षा-पर्यावरण संरक्षण की जानकारी दी। अभा कायस्थ महासभा के सुनील श्रीवास्तव ने मंदिर जोड़ो और वैवाहिक परिचय सम्मेलन का ब्योरा दिया।