वॉशिंगटन डीसी। मध्य पूर्व में शांति की कोशिशें अभी पूरी तरह आकार भी नहीं ले पाई थीं कि एक नई भू-राजनीतिक हलचल ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, तो दूसरी ओर चीन की संभावित भूमिका ने इस समीकरण को और जटिल बना दिया है। इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप का सख्त रुख सामने आया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज कर दी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट तौर पर चीन को चेतावनी दी है कि अगर वह ईरान को हथियारों की आपूर्ति करता है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। ट्रंप ने इस मुद्दे को अमेरिका की सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जोड़ते हुए कहा कि यह किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत जारी है, लेकिन अमेरिका हर परिस्थिति में मजबूत स्थिति में रहेगा और अपने हितों की रक्षा करेगा।
Strait of Hormuz में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका को आशंका है कि ईरान ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में बारूदी सुरंगें बिछाई हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खतरा पैदा हो सकता है। इसके जवाब में अमेरिका ने अपने माइन स्वीपर्स तैनात कर दिए हैं, जो समुद्र में संभावित खतरों को निष्क्रिय करने का काम कर रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान ने दावा किया है कि उसने किसी भी सैन्य जहाज को इस मार्ग से गुजरने नहीं दिया है, जिससे स्थिति और संवेदनशील हो गई है।
अमेरिका और ईरान के बीच हुआ संघर्षविराम फिलहाल बेहद नाजुक स्थिति में है। दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन जमीनी हालात में कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा है। सैन्य तैनाती अब भी बनी हुई है और दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी जारी है। अमेरिका को शक है कि, ईरान इस संघर्षविराम का फायदा उठाकर अपने हथियारों के भंडार को फिर से मजबूत कर रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच अविश्वास और बढ़ गया है।
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अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, चीन आने वाले हफ्तों में ईरान को उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम उपलब्ध करा सकता है। इन सिस्टम्स में MANPADS जैसे कंधे से दागे जाने वाले मिसाइल सिस्टम शामिल हो सकते हैं, जो कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों को आसानी से निशाना बना सकते हैं। रिपोर्ट्स में यह भी संकेत दिया गया है कि चीन इन हथियारों की सप्लाई सीधे न करके तीसरे देशों के जरिए कर सकता है, ताकि उसकी भूमिका सार्वजनिक रूप से सामने न आए।
हाल की घटनाओं से यह संकेत मिलते हैं कि, इस तरह के उन्नत हथियारों का इस्तेमाल पहले ही किया जा चुका है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी F-15E फाइटर जेट और ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टरों को निशाना बनाया गया था, जिसमें कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल प्रणाली के इस्तेमाल की आशंका जताई गई है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने भी दावा किया है कि उन्होंने एक नए और एडवांस डिफेंस सिस्टम का उपयोग किया, हालांकि इसकी पूरी जानकारी सामने नहीं आई है।
विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा भी चल रही है कि ईरान के पास पहले से चीन का HQ-9B मिसाइल सिस्टम हो सकता है। यह एक लंबी दूरी की आधुनिक एयर डिफेंस प्रणाली है, जो बड़े स्तर पर हवाई हमलों को रोकने की क्षमता रखती है। हालांकि इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अगर यह सच होता है, तो इससे क्षेत्र में सैन्य संतुलन पर बड़ा असर पड़ सकता है।
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चीन ने ईरान को हथियार देने के सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास ने स्पष्ट किया कि उसने इस संघर्ष में शामिल किसी भी पक्ष को हथियार नहीं दिए हैं। चीन ने अमेरिका पर बेबुनियाद आरोप लगाने और स्थिति को अनावश्यक रूप से बढ़ाने का आरोप लगाया है। साथ ही, उसने सभी पक्षों से संयम बरतने और तनाव कम करने की अपील भी की है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर वैश्विक राजनीति पर भी साफ दिखाई दे रहा है। Xi Jinping और डोनाल्ड ट्रंप के बीच होने वाली संभावित मुलाकात पर इसका असर पड़ सकता है। अमेरिका और चीन के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंध इस मुद्दे के कारण और बिगड़ सकते हैं, जिससे वैश्विक कूटनीतिक संतुलन प्रभावित होने की आशंका है।
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हथियारों की आपूर्ति में तीसरे देशों का इस्तेमाल एक आम रणनीति मानी जाती है। इसके जरिए असली सप्लायर की पहचान छिपाई जा सकती है और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचा जा सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन भी इसी रणनीति का इस्तेमाल कर सकता है, जिससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाएगा कि हथियारों की असली आपूर्ति कहां से हो रही है।
मौजूदा हालात को देखते हुए यह आशंका जताई जा रही है कि, यह संघर्ष फिर से भड़क सकता है। संघर्षविराम के बावजूद दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है और चीन की संभावित भूमिका इसे और जटिल बना रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में यह टकराव एक बड़े युद्ध का रूप ले सकता है।