बशीर बद्र का संघर्ष :कभी 85 रुपए महीने में पुलिस की नौकरी की तो कभी प्रोफेसर रहे, हर दौर में जिंदा रखी शायरी

भोपाल। बशीर बद्र की जिंदगी सिर्फ शायरी की नरम दुनिया नहीं थी, बल्कि संघर्षों की सख्त ज़मीन भी थी। वे एक कंप्लीट फैमिली मैन भी रहे। वालिद के इंतकाल के बाद घर की तमाम जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गईं। पढ़ाई बीच में छूट गई और महज़ 85 रुपए महीने की नौकरी के लिए उन्हें पुलिस विभाग में काम करना पड़ा। मगर मुश्किलों ने उनके भीतर के शायर को कभी मरने नहीं दिया। कम उम्र में ही उनकी ग़ज़लें पत्रिकाओं में छपने लगीं और अदब की दुनिया ने इस नई आवाज को पहचान लिया।
अधूरी पढ़ाई से अलीगढ़ तक का सफर
जिंदगी की मार के बावजूद बशीर बद्र ने हार नहीं मानी। उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू करने का फैसला किया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अपनी शिक्षा पूरी की। यही वह दौर था, जब उनका कलाम लोगों के दिलों में उतरने लगा। उन्होंने उर्दू को मुश्किल लफ्जों से नहीं, बल्कि आम आदमी की जुबान से सजाया। यही वजह रही कि उनकी शायरी हर तबके के लोगों तक पहुंची।
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जब मोहब्बत लिखने वाले शायर को मिली नफरत की सजा
साल 1987 में मेरठ दंगों ने बशीर बद्र की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। उस दौर में वह मेरठ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे और पूरा शहर उनकी शायरी का दीवाना था। लेकिन सांप्रदायिक दंगों की आग में उनका घर जला दिया गया। उस आग में सिर्फ दीवारें नहीं जलीं, बल्कि उनकी कई अनमोल और अप्रकाशित रचनाएं भी हमेशा के लिए राख हो गईं। मोहब्बत लिखने वाले शायर को नफरत की सबसे दर्दनाक सजा मिली थी।
मेरठ अजनबी हुआ और भोपाल दिल में समाया
जिस शहर ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया था, वही शहर दंगों के बाद उन्हें अजनबी लगने लगा। हर महफ़िल में जिनकी ग़ज़लें गूंजती थीं, वही शहर अब खामोश और डर से भरा हुआ था। अपने ही लोग पराये लगने लगे थे। टूटे दिल और बिखरे एहसासों के साथ बशीर बद्र ने आखिरकार मेरठ छोड़ दिया और भोपाल को अपना नया ठिकाना बना लिया। लेकिन उनके भीतर का दर्द उनकी शायरी में हमेशा जिंदा रहा।
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आसान अल्फाज में गहरी बात कहने का हुनर
बशीर बद्र उन शायरों में शामिल थे, जिन्होंने ग़जल को आम लोगों तक पहुंचाया। उनकी भाषा में ऐसी मिठास और रवानगी थी, जो सीधे दिल में उतर जाती थी। उन्होंने मुश्किल उर्दू की जगह बोलचाल की जुबान को अपनाया। शायद यही वजह है कि उनकी शायरी आज भी हर पीढ़ी के बीच उतनी ही लोकप्रिय है। उनके अशआर महज लफ्ज नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बात का आईना थे।
सम्मान मिले, मगर यादें बिछड़ती गईं
साहित्य और उर्दू अदब में उनके बेमिसाल योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड भी मिला। उनकी मशहूर कृतियों में इकाई, इमेज, आमद, आस, आसमान और आहट शामिल हैं। मगर जिंदगी के आख़िरी दौर में बढ़ती उम्र के साथ उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई और एक समय ऐसा भी आया, जब लोगों की यादों में बसने वाला यह शायर खुद बहुत कुछ भूलने लगा था।
अल्फाज रहेंगे, शायर चला गया
बशीर बद्र भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें आने वाली कई पीढ़ियों तक मोहब्बत, दर्द और इंसानियत का पैगाम देती रहेंगी। कुछ लोग सिर्फ जीते नहीं, अपने अल्फाजों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। बशीर बद्र भी उन्हीं में से एक थे।












