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दीपावली कभी अक्टूबर तो कभी नवंबर में क्यों आती है? 51 साल के आंकड़ों में सामने आया सूर्य-चंद्रमा का 50-50 गणित

सारिका घारू के 51 साल के विश्लेषण में दीपावली 26 बार अक्टूबर और 25 बार नवंबर में आई। जानिए सूर्य-चंद्रमा का गणित और 19 साल का चक्र।
दीपावली कभी अक्टूबर तो कभी नवंबर में क्यों आती है? 51 साल के आंकड़ों में सामने आया सूर्य-चंद्रमा का 50-50 गणित

सोहागपुर। हर साल दीपावली का त्योहार आता है तो लोगों के मन में एक सवाल जरूर उठता है कि कभी दीपावली अक्टूबर में तो कभी नवंबर में क्यों मनाई जाती है? आखिर ऐसा क्या कारण है कि रोशनी के इस पर्व की तारीख हर साल बदल जाती है?

इस सवाल का जवाब विज्ञान और खगोल विज्ञान के गणित में छिपा है। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त विज्ञान प्रसारक सारिका घारू ने वर्ष 1986 से लेकर 2036 तक के 51 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण कर दीपावली की तारीखों से जुड़े कई रोचक वैज्ञानिक तथ्य सामने रखे हैं।

सारिका घारू के विश्लेषण के अनुसार, 1986 से 2036 तक के 51 वर्षों में दीपावली 26 बार अक्टूबर और 25 बार नवंबर महीने में मनाई गई। यानी दोनों महीनों में दीपावली पड़ने का अनुपात लगभग 50-50 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा दर्शाता है कि दीपावली की तारीखों में होने वाला बदलाव किसी अनियमितता का परिणाम नहीं, बल्कि सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित पंचांग की गणना से जुड़ा है।

17 अक्टूबर को सबसे जल्दी और 14 नवंबर को सबसे देर से दीपावली

सारिका घारू के अनुसार, विश्लेषण किए गए कालखंड में सबसे जल्दी दीपावली 17 अक्टूबर को आई, जबकि सबसे देरी से 14 नवंबर को मनाई गई। अक्टूबर के मध्य में दीपावली होने पर मौसम में मानसून के बाद की नमी और गर्माहट बनी रह सकती है, जबकि नवंबर के मध्य तक उत्तर भारत के कई हिस्सों में गुलाबी ठंड और कोहरे की शुरुआत होने लगती है।

सूर्य और चंद्रमा की गति में छिपा है रहस्य

सारिका घारू बताती हैं कि अंग्रेजी कैलेंडर मुख्य रूप से सूर्य की गति पर आधारित है, जिसमें सामान्य वर्ष 365 दिनों का होता है। वहीं भारतीय हिंदू पंचांग चंद्र-सौर गणना पर आधारित है। चंद्रमा की कलाओं और तिथियों के आधार पर चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है। इस तरह सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच करीब 11 दिनों का अंतर आ जाता है।

इस अंतर को संतुलित करने के लिए भारतीय पंचांग में समय-समय पर अधिकमास जोड़ा जाता है। सामान्यतः लगभग हर तीन वर्ष में एक अतिरिक्त चंद्रमास आने से चंद्र और सौर गणना के बीच सामंजस्य बना रहता है। इसी गणित के कारण हिंदू त्योहारों की तारीखें अंग्रेजी कैलेंडर में आगे-पीछे होती रहती हैं।

19 साल का खगोलीय चक्र भी है खास

सारिका घारू के विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण पहलू 19 वर्षों का खगोलीय चक्र है। चंद्रमा और सूर्य की गति के बीच एक ऐसा संबंध बनता है, जिसके कारण लगभग 19 वर्षों बाद चंद्र कलाओं और सौर कैलेंडर की स्थिति काफी हद तक दोहराने लगती है। इसे खगोल विज्ञान में मेटोनिक चक्र के नाम से जाना जाता है।

इसके उदाहरण के रूप में वर्ष 2001 और 2020 को देखा जा सकता है। दोनों ही वर्षों में दीपावली 14 नवंबर को मनाई गई थी। हालांकि यह चक्र तारीखों की बिल्कुल सटीक पुनरावृत्ति की गारंटी नहीं देता, बल्कि लगभग समान खगोलीय स्थिति को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार है।

दीपावली की तारीख का पर्यावरण से भी है संबंध

सारिका घारू के अनुसार, दीपावली की तारीखों का बदलना केवल कैलेंडर और खगोल विज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध मौसम और पर्यावरण से भी दिखाई देता है। अक्टूबर के मध्य में दीपावली होने पर वातावरण में मानसून के बाद की नमी और अपेक्षाकृत गर्म मौसम रहता है। वहीं नवंबर के मध्य में तापमान गिरने और हवा की गति कम होने की परिस्थितियों में पटाखों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण की समस्या को और गंभीर बना सकता है। विशेषकर उत्तर भारत में कोहरे के साथ प्रदूषक कण मिलने से स्मॉग की स्थिति बन सकती है।

पूर्वजों के खगोलीय ज्ञान का प्रमाण है दीपावली

सारिका घारू कहती हैं कि दीपावली केवल दीपों और उत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय परंपरा में विकसित खगोलीय गणना और प्रकृति के साथ समय निर्धारण के संबंध को समझने का अवसर भी है। सूर्य और चंद्रमा की गतियों के आधार पर तैयार पंचांग हमारी प्राचीन वैज्ञानिक समझ का परिचायक है। दीपावली की बदलती तारीखें इसी चंद्र-सौर गणना का रोचक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

इस प्रकार अक्टूबर और नवंबर के बीच बदलती दीपावली की तारीखों के पीछे धार्मिक परंपरा के साथ-साथ खगोलीय गणित का भी महत्वपूर्ण योगदान है।

Neelam Tiwari
By Neelam Tiwari

नीलम तिवारी - सोहागपुर के वरिष्ठ पत्रकार, 40 वर्षों से निष्पक्ष, जनसरोकार और ग्रामीण मुद्दों की निर्...

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