धार भोजशाला - महाधिवक्ता का पलटवार, ‘मस्जिद नहीं मंदिर’ के साक्ष्य पेश

धार स्थित भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में चल रही सुनवाई में गुरुवार को तीखी बहस देखने को मिली। राज्य की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने मस्जिद पक्ष के तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें “अधूरा और भ्रामक” बताया।
और पढ़ें: मेट गाला में ‘यूरिन प्रोटेस्ट’! फैशन की सबसे बड़ी रात में बवाल, जेफ बेजोस के खिलाफ ऐसा विरोध क्यों?
1935 की अधिसूचना पर सख्त सवाल
महाधिवक्ता ने कहा कि मस्जिद पक्ष द्वारा जिस अधिसूचना का हवाला दिया जा रहा है, वह कानूनी रूप से स्वतः मान्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता पूर्व किसी भी राजदरबार के आदेश को सीधे कानून नहीं माना जा सकता, जब तक वह संविधान की कसौटी पर खरा न उतरे।
ASI रिपोर्ट बनी सबसे बड़ा आधार
महाधिवक्ता ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सर्वे रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि वहां मिली मूर्तियां साफ तौर पर मंदिर होने की पुष्टि करती हैं। अर्द्धनारिश्वर, कुबेर, विष्णु और नरसिंह जैसी मूर्तियां 10वीं-11वीं सदी की बताई गई हैं, जो इस स्थल के मंदिर स्वरूप की ओर इशारा करती हैं।
कोर्ट में यह भी तर्क रखा गया कि 1935 में धार दरबार द्वारा दिया गया आदेश दबाव में लिया गया फैसला था। दीवान नाटकर की पुस्तक का हवाला देते हुए बताया गया कि नमाज की अनुमति देने के लिए दबाव बनाया गया था, जिसके बाद अधिसूचना जारी की गई।
सुनवाई के दौरान जैन समाज की ओर से भी पक्ष रखा गया। एडवोकेट दिनेश पी. राजभर ने सर्वे की वीडियोग्राफी उपलब्ध कराने की मांग की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने उनसे यह भी पूछा कि वे अपने तर्कों से क्या साबित करना चाहते हैं।












