Manisha Dhanwani
9 Jan 2026
कोपनहेगन। अमेरिका के वेनेजुएला पर हमले के बाद वैश्विक भू-राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इसी बीच ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इस स्वायत्त द्वीप पर सैन्य कार्रवाई और जबरन कब्जे की धमकी के बाद डेनमार्क ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।
डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि, अगर किसी विदेशी ताकत ने डेनिश इलाके या ग्रीनलैंड में घुसपैठ की, तो सैनिक बिना किसी कमांडर के आदेश का इंतजार किए सीधे गोली चला सकते हैं। यह बयान न केवल अमेरिका, बल्कि पूरी NATO व्यवस्था के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने स्थानीय अखबार Berlingske को बताया कि, यह निर्देश नया नहीं है। दरअसल, 1952 में कोल्ड वॉर के दौरान बनाए गए सैन्य नियम के तहत यह स्पष्ट किया गया था कि अगर डेनिश संप्रभुता को खतरा हो, तो सैनिकों को तुरंत कार्रवाई करनी होगी।
इस नियम की नींव अप्रैल 1940 में पड़ी, जब नाजी जर्मनी ने अचानक डेनमार्क पर हमला कर दिया था। उस समय संचार व्यवस्था आंशिक रूप से ठप हो गई थी, जिसके कारण सेना को स्पष्ट आदेश नहीं मिल सके। उसी अनुभव से सबक लेते हुए यह नियम बनाया गया, ताकि भविष्य में सैनिक आदेश के इंतजार में निष्क्रिय न रहें। डेनमार्क का कहना है कि, यह नियम आज भी पूरी तरह लागू है और किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं गया है।
ग्रीनलैंड में किसी गतिविधि को हमला माना जाएगा या नहीं, इसका फैसला वहां तैनात जॉइंट आर्कटिक कमांड करेगी। यही सैन्य अथॉरिटी तय करेगी कि कोई विदेशी जहाज, विमान या सैनिक गतिविधि सामान्य मौजूदगी है या डेनिश संप्रभुता के लिए सीधा खतरा। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य उपस्थिति को और मजबूत करने की बात कर रहा है।
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डोनाल्ड ट्रंप पहले भी कई बार ग्रीनलैंड को खरीदने की बात कह चुके हैं। अब उनका रुख और ज्यादा आक्रामक हो गया है। ट्रंप का दावा है कि, रूस और चीन की बढ़ती सैन्य और नौसैनिक गतिविधियों के कारण आर्कटिक क्षेत्र अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम बन गया है।
ट्रंप ने हालिया बयान में कहा, ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी है। अगर जरूरत पड़ी, तो हम हर विकल्प पर विचार करेंगे। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलीन लेविट ने भी स्वीकार किया है कि प्रशासन ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य विकल्पों को खारिज नहीं कर रहा।
हालांकि अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस मुद्दे पर अलग तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने या खरीदने की जरूरत नहीं है, क्योंकि 1951 का अमेरिका-डेनमार्क रक्षा समझौता पहले से ही अमेरिका को वहां सैन्य गतिविधियों की अनुमति देता है।
डेनिश इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज के रिसर्चर मिकेल रुंगे ओलेसेन का कहना है कि, अगर अमेरिका सही तरीके से बातचीत करे, तो उसे ग्रीनलैंड में लगभग सब कुछ मिल सकता है, बिना जबरदस्ती किए।
ग्रीनलैंड की आबादी लगभग 57 हजार है, और वहां के लोगों ने अमेरिका की मंशा पर कड़ा विरोध जताया है। हालिया सर्वे में 85% ग्रीनलैंडवासियों ने अमेरिकी कब्जे का विरोध किया। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने दो टूक कहा कि, ग्रीनलैंड न तो बिकाऊ है और न ही किसी के दबाव में आने वाला है।
ग्रीनलैंड को यह अधिकार भी हासिल है कि, वह भविष्य में स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह करा सके, जिससे डेनमार्क भी अकेले फैसला नहीं ले सकता।
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डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने अमेरिका को बेहद सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि, अगर अमेरिका किसी NATO सहयोगी देश पर सैन्य हमला करता है, तो यह NATO के अंत और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के टूटने की शुरुआत होगी।
उनके इस बयान के बाद ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड और स्पेन समेत कई यूरोपीय देशों ने डेनमार्क के समर्थन में साझा रुख अपनाया है।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा कि, डेनमार्क ग्रीनलैंड को वैश्विक सुरक्षा के लिए रणनीतिक आधार के रूप में विकसित करने में असफल रहा है।
उन्होंने कहा कि, ग्रीनलैंड सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए अहम है। मिसाइल डिफेंस में इसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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ग्रीनलैंड की अहमियत सिर्फ उसकी भौगोलिक स्थिति तक सीमित नहीं है।
मुख्य कारण:
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ग्रीनलैंड के पास मौजूद एक बड़ा इलाका हवाई निगरानी से खाली था, जिसे ‘ग्रीनलैंड एयर गैप’ कहा जाता था। नाजी जर्मनी की पनडुब्बियां इसी रास्ते से गुजरकर मित्र देशों के जहाजों पर हमला करती थीं। इसी वजह से आज भी ग्रीनलैंड को वैश्विक सैन्य रणनीति का अहम स्तंभ माना जाता है।
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