Shivani Gupta
6 Jan 2026
वॉशिंगटन डीसी। भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों में आने वाले दिनों में और तनाव देखने को मिल सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के खिलाफ कड़े आर्थिक प्रतिबंधों से जुड़े एक अहम बिल को मंजूरी दे दी है। इस प्रस्तावित कानून के तहत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
इस बिल का सीधा असर भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर पड़ने की आशंका है, जो यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से सस्ता तेल खरीद रहे हैं। अगर यह कानून लागू होता है, तो भारत के लिए रूस से तेल खरीदना बेहद महंगा सौदा साबित हो सकता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘Sanctioning of Russia Act 2025’ नाम के इस बिल को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी है। रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने बताया कि, बुधवार को व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रंप से उनकी मुलाकात हुई थी, जिसमें इस बिल पर सहमति बनी। ग्राहम के अनुसार, यह बिल पिछले कई महीनों से तैयार किया जा रहा था और अब इसे अगले हफ्ते अमेरिकी संसद में वोटिंग के लिए पेश किया जा सकता है। व्हाइट हाउस से मंजूरी मिलने के बाद इस बिल के पास होने की संभावनाएं काफी बढ़ गई हैं।
इस कानून का मुख्य उद्देश्य यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। अमेरिका का आरोप है कि, रूस से तेल, गैस और यूरेनियम जैसे ऊर्जा उत्पादों की खरीद से मॉस्को को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक मदद मिल रही है।
अमेरिका का मानना है कि, जब तक रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई पर रोक नहीं लगेगी, तब तक युद्ध को रोकना मुश्किल होगा। इसी वजह से अब अमेरिका सीधे उन देशों पर कार्रवाई की तैयारी में है, जो रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीद रहे हैं।
बिल के सबसे सख्त प्रावधान के अनुसार, अगर रूस शांति वार्ता में सहयोग नहीं करता या किसी समझौते का उल्लंघन करता है, तो अमेरिका को यह अधिकार मिल जाएगा कि वह रूस से तेल खरीदने वाले देशों के अमेरिकी आयात पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सके।
भारत इस मामले में बेहद अहम भूमिका में है, क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद भारत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले सबसे बड़े देशों में शामिल रहा है। सस्ते रूसी तेल की वजह से भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कीं और घरेलू महंगाई को काफी हद तक नियंत्रित रखा। हालांकि, नया अमेरिकी कानून लागू होने की स्थिति में यही रणनीति भारत के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।
रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका पहले ही भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा चुका है। इसके अलावा, सामान्य आयात शुल्क को जोड़ने के बाद कई भारतीय उत्पादों पर कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।
इसका असर भारत के निर्यात पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान महंगे हो गए हैं, जिससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा कमजोर हुई है। अगर 500 प्रतिशत टैरिफ लागू होता है, तो भारत-अमेरिका व्यापार को बड़ा झटका लग सकता है।
भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ विवाद को सुलझाने के लिए ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही है, लेकिन फिलहाल यह प्रक्रिया अटकी हुई है। भारत की मांग है कि-
वहीं अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि और डेयरी सेक्टर में अमेरिकी उत्पादों के लिए ज्यादा बाजार खोले। भारत सरकार साफ कर चुकी है कि वह अपने किसानों और डेयरी सेक्टर के हितों से कोई समझौता नहीं करेगी। इसी वजह से अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।
सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने दावा किया कि, 5 जनवरी को वे भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के आवास पर गए थे। इस मुलाकात में भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने का मुद्दा प्रमुखता से उठा था। ग्राहम के अनुसार, भारतीय राजदूत ने उनसे आग्रह किया था कि वे राष्ट्रपति ट्रंप तक यह संदेश पहुंचाएं कि भारत पर लगाया गया 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ हटाया जाए। भारत का तर्क है कि, उसने ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए रूस से तेल खरीदा है।
इस बीच भारत ने रूस से कच्चे तेल के आयात में कमी के संकेत भी दिए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक-
नवंबर में भारत का रूसी तेल आयात: 17.7 लाख बैरल प्रतिदिन था।
दिसंबर में घटकर: 12 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया।
आने वाले महीनों में यह आंकड़ा 10 लाख बैरल प्रतिदिन से नीचे जा सकता है।
नवंबर 2021 के बाद यह पहली बार है, जब भारत ने रूस से तेल आयात में इतनी बड़ी कटौती की है। अमेरिका ने रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाए थे।
इन प्रतिबंधों के बाद भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल खरीदना और भुगतान करना मुश्किल होता जा रहा है। यही वजह है कि भारत अब वैकल्पिक स्रोतों से तेल आयात बढ़ाने पर विचार कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ‘Sanctioning of Russia Act 2025’ संसद से पास हो जाता है, तो भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में तनाव और बढ़ सकता है। इसके साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता आएगी और मित्र देशों के बीच राजनीतिक मतभेद भी गहरे हो सकते हैं। भारत के लिए यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन के बीच एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है।