Naresh Bhagoria
30 Nov 2025
पल्लवी वाघेला, भोपाल। कंजर... ये शब्द सुनते ही सबके मन में पहला भाव आता है क्राइम। लेकिन, आज हम आपको बताने जा रहे है इसी समुदाय की एक लड़की की कहानी जिसने विपरीत परिस्थितियों में पढ़ाई की और कम उम्र में ही एक किताब लिख डाली। इस किताब को दिल्ली में पहला पुरस्कार भी मिला। हम बात कर रहे हैं भोपाल की वंदना झंझोरिया की। कंजर (विमुक्त) समुदाय की वंदना में पढ़ने की चाह हमेशा से थी। परिवार के विरोध के बीच भी वंदना ने न केवल पढ़ाई जारी रखी, बल्कि लिखने की चाह को भी जिंदा रखा। वंदना ने अपने आस-पास के अनुभवों को शब्दों में पिरोया और उनकी लिखी किताब ‘अलगाव’ ने दिल्ली में फर्स्ट प्राइज पाया। रूम टू रीड संस्था के नई दिल्ली में आयोजित प्रतिष्ठित समारोह में वंदना को बीते माह ‘रूम टू रीड यंग राइटर अवार्ड’ से नवाजा गया।
वंदना बताती हैं - पैसों की दिक्कत थी, पढ़ाई छोड़नी पड़ी, पन्नी बीनने, दारू बेचने का काम किया। फिर मुस्कान संस्था की दीदी मिलीं जिन्होंने बताया कि वहां बिना फीस के पढ़ाई होती है। दसवीं पास कर आगे 12वीं की परीक्षा देने वाली हूं। आगे लॉ की पढ़ाई भी करना चाहती हूं, ताकि जो गलत है उसका विरोध करने के लिए मुझे पर्याप्त नॉलेज हो।
वंदना कहती हैं -जब लिखना शुरू किया तब वो मेरे लिए सिर्फ अपनी फीलिंग्स को व्यक्त करने का जरिया था। आठवीं में थी, जब मैंने अलगाव लिखी। यह उन दो बच्चों की कहानी है जिन्हें इसलिए अलग होना पड़ा क्योंकि वे नॉनवेज खाते थे। झांसी के स्कूल में मेरे साथ एक मुस्लिम लड़की थी। बाकी बच्चे हम दोनों से यह कहकर दूर रहते थे कि हम मांस खाते हैं। इस वजह से हम दोनों की दोस्ती गहरी हो गई। लेकिन, लोग कैसे धर्म-जाति या किसी अन्य चीज को हथियार बनाकर अलगाव पैदा करते हैं। इसी पर यह कहानी है। एक तरीके से यह मेरे जीवन की वो खिड़की है जिसे मैंने सबके लिए खोल दिया है। इस कहानी का प्रकाशन भी मुस्कान द्वारा ही किया गया है।
मैंने कभी सोचा नहीं था कि मेरी भावनाएं इतने बड़े मंच पर सराही जाएंगी। जब मैं दिल्ली गई तो यहां अन्य राइटर से मिलकर उनका काम देखकर मेरी सोच और भी विस्तृत हो गई है। मेरे लिखने का शौक जो कहीं छूट रहा था, उसे फिर से बल मिल गया है। अब मैं लिखना कभी नहीं छोड़ूंगी। अभी एक नई कहानी पर काम शुरू कर दिया है, 12वीं की परीक्षा के साथ ही इसे जारी रखूंगी।