अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के क्रीमी लेयर नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि किसी भी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में रखना या नॉन-क्रीमी लेयर (NCL) का दर्जा देना केवल उसकी या उसके माता-पिता की आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए पद की स्थिति और अन्य मानकों को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा।
यह फैसला जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने सुनाया। कोर्ट ने मद्रास, केरल और दिल्ली हाईकोर्ट के उन फैसलों को बरकरार रखा है जो सिविल सेवा परीक्षाओं में ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर के लाभ से जुड़े मामलों में दिए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल आय देखकर नहीं किया जा सकता। 1993 के मूल दिशानिर्देशों के अनुसार उम्मीदवार के माता-पिता का पद, नौकरी की स्थिति और अन्य सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी उम्मीदवार के माता-पिता सरकारी सेवा में ग्रुप C या ग्रुप D (क्लास III या IV) में हैं, तो उनकी सैलरी को क्रीमी लेयर तय करने के लिए नहीं जोड़ा जाएगा। इसके अलावा कृषि से होने वाली आय को भी पूरी तरह बाहर रखा जाएगा।
क्रीमी लेयर तय करने के लिए परिवार की अन्य स्रोतों से होने वाली आय (जैसे बिजनेस, किराया, प्रॉपर्टी आदि) को ही देखा जाएगा। अगर यह आय तीन लगातार वर्षों में औसतन 8 लाख रुपए सालाना से कम है, तो उम्मीदवार को नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के उस पत्र के पैरा 9 को अमान्य घोषित कर दिया, जिसमें बैंक, प्राइवेट सेक्टर या पीएसयू कर्मचारियों की सैलरी को क्रीमी लेयर में जोड़ने की बात कही गई थी। अदालत ने इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारियों और निजी या पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।
यह फैसला उन हजारों ओबीसी उम्मीदवारों के लिए राहत लेकर आया है जिन्हें पहले केवल सैलरी के आधार पर क्रीमी लेयर मान लिया गया था और वे आरक्षण का लाभ नहीं ले पाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस फैसले को रेट्रोस्पेक्टिव यानी पिछली तारीख से लागू किया जाएगा।
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अदालत ने केंद्र सरकार और DoPT को इस फैसले को लागू करने के लिए 6 महीने का समय दिया है। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पद (सुपरन्यूमरेरी पोस्ट्स) भी बनाए जा सकते हैं ताकि किसी अन्य कर्मचारी की सीनियरिटी प्रभावित न हो। आगे सिविल सेवा परीक्षा में जिला मजिस्ट्रेट या तहसीलदार द्वारा जारी वैध OBC-NCL प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जाएगी और केवल सैलरी के आधार पर उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने की प्रक्रिया खत्म की जाएगी।