रोजमर्रा के सामान होंगे महंगे!कंपनियां बढ़ा सकती हैं कीमतें, पैकेजिंग और कच्चे माल की लागत में करीब 10% की बढ़ोतरी

आने वाले महीनों में रोजमर्रा के इस्तेमाल की कई जरूरी चीजें महंगी हो सकती हैं। सिस्टेमैटिक्स रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार कच्चे माल और पैकेजिंग लागत में लगातार हो रही बढ़ोतरी से कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है। इस दबाव को कम करने के लिए कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाने की तैयारी में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक विभिन्न श्रेणियों की कंपनियां पिछले एक-दो महीनों में ही अपने उत्पादों के दाम औसतन 3% से 7% तक बढ़ा चुकी हैं।
कच्चे माल की लागत में करीब 10% की बढ़ोतरी
विश्लेषकों के अनुसार कंपनियों की रॉ मटीरियल बास्केट की लागत औसतन करीब 10% बढ़ गई है। इसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ रहा है। यही कारण है कि FMCG और कंज्यूमर प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियां कीमतों में बढ़ोतरी को मजबूर हैं। कई कंपनियां कीमत बढ़ाने के अलावा ‘ग्रामेज कट’ की रणनीति भी अपना सकती हैं। यानी उत्पाद की कीमत समान रखकर पैकेट का वजन या मात्रा कम की जा सकती है।
पर्सनल केयर उत्पादों में सबसे ज्यादा महंगाई
हाल के आंकड़ों के अनुसार पर्सनल केयर, सोशल प्रोटेक्शन और अन्य संबंधित उत्पादों में सबसे ज्यादा महंगाई दर्ज की गई है। इसके अलावा पान-तंबाकू उत्पाद, खाद्य एवं पेय पदार्थ, रेस्टोरेंट सेवाएं, शिक्षा और कपड़ों की श्रेणियों में भी कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई है। खाने-पीने की चीजों के महंगे होने का असर सीधे आम परिवारों के मासिक बजट पर पड़ सकता है।
पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में बड़ी छलांग
रिपोर्ट में बताया गया है कि शैम्पू की बोतलों, डिटर्जेंट कंटेनरों और फ्लेक्सिबल पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले HDPE प्लास्टिक की कीमतों में करीब 56% तक की बढ़ोतरी हुई है। पैकेजिंग लागत बढ़ने से कंपनियों के लिए उत्पादन खर्च काफी बढ़ गया है जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
क्रूड ऑयल और पाम ऑयल भी हुए महंगे
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में करीब 32% तक की तेजी दर्ज की गई है। वहीं पाम ऑयल के दाम भी लगभग 11% बढ़े हैं। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से परिवहन, पैकेजिंग और निर्माण लागत प्रभावित होती है जबकि पाम ऑयल खाद्य उत्पादों से लेकर कई उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण में इस्तेमाल होता है।
अप्रैल में बढ़ी खुदरा महंगाई
देश की खुदरा महंगाई अप्रैल में बढ़कर 3.48% पर पहुंच गई जबकि मार्च में यह 3.40% थी। महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी रही। फूड इन्फ्लेशन अप्रैल में बढ़कर 4.20% हो गई जो मार्च में 3.87% थी। इससे संकेत मिलता है कि खाने-पीने की वस्तुओं पर दबाव अभी भी बना हुआ है।
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कंपनियों के मुनाफे पर भी असर
कच्चे माल की बढ़ती लागत का असर कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन पर भी दिखने लगा है। मार्च तिमाही में कई बड़ी कंपनियों के ग्रॉस मार्जिन में गिरावट दर्ज की गई। सालाना आधार पर यह करीब 0.50% तक घटा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में इस लागत दबाव का प्रभाव और स्पष्ट दिखाई दे सकता है।
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कीमतें बढ़ेंगी, लेकिन बिक्री पर पड़ सकता है असर
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि लगातार बढ़ती महंगाई से उपभोक्ताओं की खरीदारी क्षमता प्रभावित हो सकती है। कंपनियां कीमतें बढ़ाकर अपनी लागत निकालने की कोशिश करेंगी लेकिन इससे सामान की खपत और बिक्री की रफ्तार धीमी पड़ने का जोखिम भी बढ़ सकता है। यानी आने वाले समय में कंपनियों की कमाई तो बढ़ सकती है लेकिन महंगे उत्पादों की वजह से मांग पर दबाव बनने की आशंका बनी रहेगी।












