गेट बंद, दीवारों पर नोटिस...जयपुर पोलो ग्राउंड को लेकर केंद्र और पोलो संघ आमने-सामने

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सबसे चर्चित और ऐतिहासिक खेल परिसरों में शामिल जयपुर पोलो ग्राउंड को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार ने इस प्रतिष्ठित मैदान का कब्जा अपने हाथ में लेते हुए परिसर को सील कर दिया। इसके साथ ही प्रवेश द्वारों को बंद कर दिया गया और परिसर की दीवारों पर सरकारी नोटिस भी लगा दिए गए। यह मैदान लंबे समय से भारतीय पोलो संघ (आईपीए) के प्रबंधन में था और देश में पोलो खेल का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। लेकिन अब केंद्र सरकार का कहना है कि जिस जमीन पर यह ग्राउंड स्थित है, उसकी लीज कई दशक पहले समाप्त हो चुकी थी और इसके बाद से यहां कब्जा वैध नहीं था।
शनिवार सुबह हुई कार्रवाई, परिसर को किया गया सील
जानकारी के मुताबिक केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) के अधिकारी शनिवार सुबह जयपुर पोलो ग्राउंड पहुंचे। अधिकारियों ने परिसर का कब्जा लेकर गेट सील कर दिए और सरकारी नियंत्रण स्थापित कर दिया। यह कार्रवाई 20 मई को जारी किए गए बेदखली आदेश के बाद की गई है। आदेश में कहा गया था कि लगभग 15.20 एकड़ जमीन को बड़े सार्वजनिक हित और जनकल्याण से जुड़े उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि अभी तक सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस जमीन पर भविष्य में कौन-सा प्रोजेक्ट या योजना लागू की जाएगी।
सरकार ने बताया क्यों लिया कब्जा
केंद्र सरकार का दावा है कि इस जमीन की लीज वर्ष 1951 में 20 साल के लिए दी गई थी। सरकार के अनुसार बाद में यह अवधि समाप्त हो गई और वर्ष 1993 के बाद से इस भूमि पर भारतीय पोलो संघ का कब्जा कानूनी रूप से वैध नहीं था। सरकारी पक्ष का कहना है कि कमाल अतातुर्क मार्ग के आसपास की कई महत्वपूर्ण जमीनें सरकारी स्वामित्व में हैं और उनका उपयोग राष्ट्रीय महत्व के कार्यों के लिए किया जा सकता है। इसी आधार पर जयपुर पोलो ग्राउंड को वापस सरकारी नियंत्रण में लिया गया है। केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि भविष्य में इस भूमि का उपयोग रक्षा ढांचे को मजबूत करने और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
अदालत से नहीं मिली तत्काल राहत
केंद्र सरकार की कार्रवाई से ठीक पहले भारतीय पोलो संघ ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। संघ ने बेदखली आदेश को चुनौती देते हुए उसके अमल पर रोक लगाने की मांग की थी। मामले की सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धीरेंद्र राणा ने आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि इसी तरह की राहत पहले भी उच्च अदालतों में मांगी जा चुकी है और वहां भी कोई राहत नहीं मिली थी। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि न्यायिक अनुशासन को देखते हुए वह इस स्तर पर बेदखली प्रक्रिया पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं है।
हाई कोर्ट में भी जारी है कानूनी लड़ाई
इस विवाद की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में भी हो चुकी है। इससे पहले केंद्र सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया था कि 12 जून तक किसी भी प्रकार की जबरन बेदखली नहीं की जाएगी। हाई कोर्ट ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया था। हालांकि अब सरकार की ओर से कार्रवाई किए जाने के बाद मामला और ज्यादा संवेदनशील हो गया है। भारतीय पोलो संघ की अपील अभी भी लंबित है और मामले की अगली सुनवाई 17 जून 2026 को निर्धारित की गई है।
भारतीय पोलो संघ ने कार्रवाई को बताया गैरकानूनी
भारतीय पोलो संघ के वकील मेजर निर्विकार सिंह (सेवानिवृत्त) ने सरकार की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि बेदखली आदेश पूरी तरह गलत, मनमाना और कानून के विपरीत है। उन्होंने कहा कि संघ इस आदेश का विस्तृत अध्ययन कर रहा है और अपने अधिकारों तथा हितों की रक्षा के लिए कानून के तहत उपलब्ध सभी विकल्पों का इस्तेमाल करेगा। मेजर निर्विकार सिंह ने यह भी कहा कि मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है, इसलिए इस समय वह इससे अधिक टिप्पणी नहीं करना चाहते।
देश का सबसे महत्वपूर्ण पोलो मैदान माना जाता है
भारतीय पोलो संघ का कहना है कि लुटियंस दिल्ली के बीचों-बीच स्थित यह 15.20 एकड़ का मैदान देश में पोलो खेल का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। यहीं पर वर्षों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की पोलो प्रतियोगिताएं आयोजित होती रही हैं। खेल जगत से जुड़े कई लोगों का मानना है कि इस मैदान का ऐतिहासिक और खेल महत्व बेहद बड़ा है। यही कारण है कि इस कार्रवाई के बाद खेल प्रेमियों और पोलो समुदाय के बीच चिंता बढ़ गई है।
दिल्ली के हरित क्षेत्रों को लेकर हाई कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने राजधानी में लगातार कम होती खुली और हरित जगहों को लेकर भी चिंता जताई थी। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि ऐसे खुले मैदान और हरित क्षेत्र लगातार खत्म होते गए तो दिल्ली का दम घुट जाएगा। कोर्ट ने सवाल उठाया था कि इतने वर्षों तक मौजूद इस भूमि की आवश्यकता सरकार को अब अचानक क्यों महसूस हुई। हालांकि यह अदालत की मौखिक टिप्पणी थी, लेकिन इसने पूरे विवाद को एक नया आयाम दे दिया।












