केंद्र सरकार ने अदालत में दायर अपने जवाब में कहा कि 10 से 50 साल की आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध भगवान अयप्पा के नैष्ठिक ब्रह्मचारी स्वरूप से जुड़ा है। यानि जीवनभर उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया। सरकार का तर्क है कि इस परंपरा को बदलने से मंदिर की मूल पूजा-पद्धति प्रभावित होगी। साथ ही अदालत से आग्रह किया गया कि धार्मिक मान्यताओं की समीक्षा आधुनिक या वैज्ञानिक नजरिए से न की जाए।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि मंदिर में प्रवेश से जुड़े नियम किसी भेदभाव की भावना से नहीं, बल्कि विशेष धार्मिक मान्यता पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि श्रद्धालु वर्षों से स्थापित परंपराओं का पालन करते आ रहे हैं और इसमें बदलाव धार्मिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
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केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालतों को धार्मिक मामलों में सीमित हस्तक्षेप करना चाहिए। सरकार का कहना है कि न्यायपालिका के पास धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने की विशेषज्ञता या संसाधन नहीं होते, ऐसे में आस्था से जुड़े मामलों में निर्णय सावधानी से लिया जाना चाहिए।
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यह सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं से जुड़ी है, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। अब केंद्र ने अदालत से इस प्रतिबंध को बरकरार रखने की अपील की है।