आज के समय में नौकरीपेशा लोगों के लिए निवेश सिर्फ बचत नहीं बल्कि भविष्य को सुरक्षित करने का जरिया बन चुका है। लोग प्रॉपर्टी, शेयर बाजार या गोल्ड में पैसा लगाते हैं ताकि वक्त आने पर अच्छा मुनाफा मिल सके। लेकिन जब उस निवेश को बेचने का समय आता है, तो सबसे बड़ी चिंता बनता है कैपिटल गेन्स टैक्स। अक्सर सही जानकारी न होने की वजह से लोग अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स में दे देते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि अगर थोड़ी समझदारी और सही प्लानिंग की जाए, तो इस टैक्स को काफी हद तक कम किया जा सकता है। टैक्स एक्सपर्ट्स भी यही सलाह देते हैं कि नियमों को समझकर चलने से आपकी मेहनत की कमाई बचाई जा सकती है।
टैक्स बचाने का सबसे असरदार तरीका है मुनाफे को दोबारा निवेश करना। Agnam Advisor के फाउंडर और CEO प्रशांत मिश्रा बताते हैं कि अगर सही तरीके से रीइन्वेस्टमेंट किया जाए और सेक्शन 54, 54F और 54EC का इस्तेमाल समझदारी से हो, तो लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स को काफी हद तक कम या खत्म किया जा सकता है। उनके मुताबिक बहुत से लोग इन सेक्शनों के बारे में जानते तो हैं, लेकिन सही समय और तरीके से इनका इस्तेमाल नहीं कर पाते, जिससे फायदा नहीं मिल पाता।
ध्रुव एडवाइजर्स के पार्टनर दीपेश छेड़ा इन नियमों को आसान शब्दों में समझाते हैं। उनका कहना है कि सेक्शन 54 तब काम आता है जब आप एक घर बेचकर दूसरा घर खरीदते हैं। वहीं सेक्शन 54F तब लागू होता है जब आप शेयर या सोना बेचकर उस पैसे से घर खरीदते हैं। इसके अलावा, सेक्शन 54EC एक और विकल्प देता है, जिसमें आप जमीन या बिल्डिंग बेचकर हुए मुनाफे को खास बॉन्ड्स में निवेश कर सकते हैं। हालांकि, इसमें निवेश की सीमा 50 लाख रुपये तक होती है। वहीं, इन सेक्शनों के तहत मिलने वाली छूट की अधिकतम सीमा 10 करोड़ रुपये तक तय की गई है।
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कई बार ऐसा होता है कि निवेशक तुरंत नई प्रॉपर्टी या किसी और विकल्प में पैसा नहीं लगा पाता। ऐसे में ‘कैपिटल गेन्स अकाउंट स्कीम’ एक अच्छा विकल्प बनकर सामने आता है। इस स्कीम में पैसा जमा करके आप टैक्स छूट का फायदा सुरक्षित रख सकते हैं। बाद में तय समय सीमा के अंदर उस पैसे को निवेश कर सकते हैं। नए नियमों के अनुसार अब इस स्कीम में पैसा जमा करने की समयसीमा बढ़ाकर बिलेटेड रिटर्न की तारीख तक कर दी गई है, जिससे टैक्सपेयर्स को थोड़ी राहत मिली है।
टैक्स नियम समय-समय पर बदलते रहते हैं और इन्हें समझना जरूरी होता है। प्रशांत मिश्रा के अनुसार हाल के बदलावों के बाद लिस्टेड इक्विटी पर 1.25 लाख रुपये से ज्यादा के लॉन्ग टर्म मुनाफे पर अब 12.5% टैक्स देना होगा। वहीं, शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स पर टैक्स बढ़ाकर 20% कर दिया गया है। इसके अलावा प्रॉपर्टी के मामले में अब टैक्सपेयर्स के पास दो विकल्प हैं या तो बिना इंडेक्सेशन के 12.5% टैक्स दें या इंडेक्सेशन के साथ 20% टैक्स चुनें। इन बदलावों के बाद टैक्स प्लानिंग पहले से ज्यादा जरूरी और थोड़ी जटिल हो गई है, इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाना जरूरी है।
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टैक्सपेयर्स अक्सर छोटी-छोटी गलतियों की वजह से बड़ा नुकसान कर बैठते हैं। प्रशांत मिश्रा बताते हैं कि कई लोग हर साल मिलने वाली 1.25 लाख रुपये की टैक्स-फ्री लिमिट का सही इस्तेमाल नहीं करते। इसके अलावा, लॉस हार्वेस्टिंग यानी घाटे को मुनाफे से एडजस्ट करने का फायदा भी लोग नहीं उठाते। वहीं, ESOPs या बोनस शेयर के मामले में होल्डिंग पीरियड की गलत गणना करने से भी टैक्स ज्यादा देना पड़ सकता है। दीपेश छेड़ा का कहना है कि कई लोग शॉर्ट टर्म मुनाफे पर भी छूट लेने की कोशिश करते हैं, जबकि ये छूट सिर्फ लॉन्ग टर्म मुनाफे पर ही लागू होती है। जॉइंट प्रॉपर्टी के मामले में भी कई बार लोग अपनी हिस्सेदारी से ज्यादा छूट क्लेम कर लेते हैं, जो गलत है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि टैक्स बचाने के लिए साल के आखिर तक इंतजार करना सही तरीका नहीं है। प्रशांत मिश्रा सलाह देते हैं कि निवेशकों को पूरे साल अपने पोर्टफोलियो पर नजर रखनी चाहिए और समय-समय पर बदलाव करते रहना चाहिए। दीपेश छेड़ा के मुताबिक, सही समय पर निवेश और सही डॉक्यूमेंटेशन बेहद जरूरी है। खरीद-बिक्री से जुड़े सभी कागजात संभालकर रखना चाहिए, क्योंकि आज के समय में इनकम टैक्स विभाग डेटा एनालिटिक्स के जरिए हर ट्रांजैक्शन पर नजर रखता है।