भोपाल:गैस पीड़ितों के अस्पताल बदहाल, बंद लिफ्टों और खाली पदों के बीच मरीज बेहाल

प्रवीण श्रीवास्तव,भोपाल। गैस त्रासदी पीड़ितों के इलाज के लिए बनाए गए गैस राहत अस्पताल अब खुद बदहाली का शिकार होते जा रहे हैं। अस्पतालों में लिफ्ट बंद होने, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और जरूरी सुविधाओं के अभाव ने मरीजों की परेशानियां कई गुना बढ़ा दी हैं। गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों और गर्भवती महिलाओं को सीढ़ियों के सहारे वार्ड तक पहुंचना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि करोड़ों की मशीनें धूल खा रही हैं और अस्पताल उधारी के सहारे चल रहे हैं। गैस राहत विभाग के छह अस्पतालों में मेंटेनेंस से जुड़ी सेवाओं का भुगतान वर्षों से लंबित है जिसके चलते लिफ्ट, फायर फाइटिंग और इलेक्ट्रिकल सिस्टम प्रभावित हो गए हैं। मरीजों को इलाज के लिए बार-बार ऊपर नीचे जाना पड़ रहा है। कई अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली हैं जबकि आधुनिक उपकरण उपयोग में ही नहीं आ पा रहे। मॉनिटरिंग कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में इन व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अस्पतालों की हालत ने गैस पीड़ितों की स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर सरकार की तैयारियों पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं।

बंद लिफ्टों ने बढ़ाई मरीजों की परेशानी
राजधानी के इंदिरा गांधी, शाकिर अली, जवाहर लाल नेहरू और कमला नेहरू अस्पतालों में लिफ्ट बंद होने से मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इंदिरा गांधी अस्पताल की तीनों लिफ्ट एक माह से बंद हैं जिससे मरीजों और उनके परिजनों को सीढ़ियों का सहारा लेना पड़ रहा है। सांस और हृदय रोग से पीड़ित मरीजों के लिए यह स्थिति और गंभीर हो गई है। अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं की संख्या भी अधिक रहती है लेकिन उन्हें भी वार्ड तक पहुंचने में परेशानी झेलनी पड़ रही है। कई मरीजों ने बताया कि जांच और दवाओं के लिए बार-बार ऊपर नीचे जाना मजबूरी बन गया है। सीढ़ियों और रैंप पर फैली गंदगी ने हालात को और खराब कर दिया है।

उधारी पर चल रहे अस्पताल, वेंडर्स ने उठाए सवाल
गैस राहत विभाग के सभी अस्पताल फिलहाल उधारी पर संचालित हो रहे हैं। लिफ्ट मेंटेनेंस, इलेक्ट्रिकल मेंटेनेंस, फायर फाइटिंग और फिल्टर प्लांट से जुड़े वेंडर्स का भुगतान वर्ष 2023 के बाद से नहीं हुआ है। भुगतान लंबित रहने के कारण कई तकनीकी सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। बुधवार को वेंडर्स ने विभाग को पत्र लिखकर जल्द भुगतान की मांग की। वेंडर्स का कहना है कि बिना भुगतान के लगातार सेवाएं देना संभव नहीं है। इलेक्ट्रिकल मेंटेनेंस से जुड़े कर्मचारियों ने भी बताया कि दो वर्षों से बकाया राशि नहीं मिली है। इसका सीधा असर अस्पतालों की व्यवस्थाओं पर दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों और स्टाफ की भारी कमी
गैस राहत अस्पतालों में स्वीकृत पदों में आधे से अधिक रिक्त पड़े हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों के 76 प्रतिशत से ज्यादा पद खाली हैं जबकि अन्य विशेषज्ञ स्टाफ की भी भारी कमी बनी हुई है। कैंसर, किडनी, फेफड़े और रेडियोलॉजी जैसे महत्वपूर्ण विभागों में विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं। नेफ्रोलॉजिस्ट नहीं होने से किडनी मरीजों का इलाज प्रभावित हो रहा है। कार्डियक स्पेशलिस्ट की कमी के कारण गंभीर मरीजों को दूसरे अस्पतालों में भेजा जाता है। कई अस्पतालों में आईसीयू तक में अन्य विभागों के डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई जा रही है। इससे मरीजों को समय पर बेहतर इलाज नहीं मिल पा रहा।
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करोड़ों के उपकरण बंद, मरीज परेशान
272 करोड़ रुपए की पुनर्वास योजना के तहत अस्पतालों में आधुनिक उपकरण लगाए गए थे लेकिन उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है। मॉड्यूलर ओटी और अन्य आधुनिक मशीनें अस्पतालों में बंद पड़ी हैं। वर्ष 2023 में खरीदी गई नई सोनोग्राफी मशीनें रेडियोलॉजिस्ट नहीं होने के कारण उपयोग में नहीं लाई जा सकीं। हर दिन दर्जनों महिला मरीजों को सोनोग्राफी के लिए भटकना पड़ता है। मास्टर लाल सिंह अस्पताल में तीस साल पुरानी एक्सरे मशीन अब भी इस्तेमाल हो रही है जो कई बार काम करते-करते बंद हो जाती है। उपकरणों के बावजूद मरीजों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।

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मॉनिटरिंग कमेटी ने उठाए गंभीर सवाल
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में गैस राहत अस्पतालों की स्थिति पर चिंता जताई है। कमेटी सदस्य पूर्णेंदु शुक्ला ने कहा कि सरकार गैस पीड़ितों के प्रति गंभीर नहीं है और रिटायर होने वाले डॉक्टरों की जगह नई नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं। उन्होंने अस्पतालों में पुराने उपकरणों और लचर व्यवस्थाओं को भी गंभीर समस्या बताया। वहीं गैस राहत विभाग के सीएमओ डॉ. एसएस राजपूत का कहना है कि मेंटेनेंस से जुड़ी तकनीकी समस्याएं जल्द ठीक कर ली जाएंगी। विभाग ने वेंडर्स को लिफ्ट सुधारने के निर्देश दिए हैं। हालांकि मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि उन्हें रोजाना परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और व्यवस्था में जल्द सुधार की जरूरत है।











