भोपाल:राजधानी में बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन पर बड़ा सवाल, 2,008 अस्पताल बेड का रिकॉर्ड गायब; प्रदेशभर में दोबारा होगा गैप एनालिसिस

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार राजधानी में अस्पतालों के 22,107 बेड हैं, जबकि मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रिकॉर्ड में केवल 20,099 बेड दर्ज हैं। रिकॉर्ड से बाहर मौजूद 2,008 बेड से निकलने वाले बायो-मेडिकल वेस्ट के सुरक्षित निपटान को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसी अंतर को दूर करने के लिए अब अस्पतालों, लैब और पैथोलॉजी केंद्रों का दोबारा सत्यापन किया जाएगा।
स्वास्थ्य विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रिकॉर्ड में बड़ा अंतर
स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार राजधानी में 22,107 अस्पताल बेड हैं, जबकि मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रिकॉर्ड में इनकी संख्या 20,099 है। यानी 2,008 अस्पताल बेड ऐसे हैं जिनका रिकॉर्ड दोनों विभागों में मेल नहीं खाता। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर अस्पतालों से निकलने वाले बायो-मेडिकल वेस्ट का डिस्पोजल कराता है। ऐसे में रिकॉर्ड से गायब इन 2,008 बेड से प्रतिदिन निकलने वाले संक्रमित वेस्ट के डिस्पोजल की जानकारी भी उपलब्ध नहीं है।
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प्रतिदिन 500 से 1 हजार किलो तक निकल सकता है संक्रमित कचरा
केन्द्र सरकार के मानक के अनुसार एक अस्पताल बेड से औसतन 0.25 से 0.50 किलोग्राम बायो-मेडिकल वेस्ट प्रतिदिन निकलता है। इस आधार पर रिकॉर्ड से बाहर मौजूद 2,008 बेड से प्रतिदिन लगभग 500 से 1,000 किलोग्राम तक बायो-मेडिकल वेस्ट निकल सकता है। यदि इस कचरे का सही वैज्ञानिक निपटान नहीं हो तो पर्यावरण और आम लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। यही वजह है कि इस अंतर को गंभीरता से लिया जा रहा है।
अब पूरे प्रदेश में होगा गैप एनालिसिस
दोनों विभागों के बीच बेड के इस अंतर की वास्तविक स्थिति जानने के लिए मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पूरे प्रदेश में दोबारा गैप एनालिसिस शुरू किया है। इसके तहत अस्पतालों, उनके बेड, लैब और पैथोलॉजी केंद्रों का दोबारा सत्यापन किया जाएगा। इसका उद्देश्य वास्तविक बायो-मेडिकल वेस्ट का सही आकलन करना और उसके सुरक्षित संग्रहण और वैज्ञानिक निपटान की व्यवस्था सुनिश्चित करना है। इसके लिए मंत्रालय स्तर पर भी जानकारी एकत्रित की जा रही है।
वैज्ञानिक निपटान नहीं हुआ तो बढ़ सकता है संक्रमण का खतरा
बायो-मेडिकल वेस्ट का वैज्ञानिक तरीके से संग्रहण, परिवहन और उपचार नहीं होने पर यह संक्रमण फैलाने का बड़ा माध्यम बन सकता है। संक्रमित सुई, सिरिंज, ड्रेसिंग सामग्री और जैविक कचरा सामान्य कचरे में मिलने या खुले में पहुंचने पर हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी, एचआईवी सहित कई गंभीर संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा मिट्टी, भूजल और आसपास का पर्यावरण भी दूषित हो सकता है। इसलिए बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के तहत इसका पृथक्करण और वैज्ञानिक निष्पादन अनिवार्य किया गया है।
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अब आंकड़ों से समझिए
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार 22,017 अस्पताल बेड हैं, जबकि मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रिकॉर्ड में 20,099 बेड दर्ज हैं। दोनों के बीच 2,008 बेड का अंतर है और प्रतिदिन लगभग 2,746 किलो बायो-मेडिकल वेस्ट निकलता है। मध्यप्रदेश के आंकड़े स्वास्थ्य विभाग के अनुसार 1,52,224 अस्पताल बेड हैं, जबकि मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रिकॉर्ड में 1,36,864 बेड दर्ज हैं। यानी 15,360 बेड का अंतर है और प्रतिदिन लगभग 17,693 किलो बायो-मेडिकल वेस्ट निकलता है। (स्त्रोत : एमपीपीसीबी की गैप एनालिसिस रिपोर्ट 2023)। एमपीपीसीबी के यूनिट हेड आकाश जैन ने कहा कि अस्पतालों में बेड की सही स्थिति पता करने के लिए गैप एनालिसिस कराया जा रहा है। इसके पूरा होते ही सही स्थिति सामने आएगी और इसके लिए मंत्रालय स्तर पर जानकारी एकत्रित की जा रही है।












