बेगमगंज में बच्चों को तनाव से उबारने और आत्महत्या रोकने कार्यशाला में दी समझाइश

व्यवहार में बदलाव को नजरअंदाज न करें
एसडीओपी सोनाली गुप्ता ने कहा कि बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, लगातार उदासी, पढ़ाई से दूरी, अकेले रहने की प्रवृत्ति या निराशा जैसी बातों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे समय में अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों से डांट-फटकार के बजाय संवेदनशीलता के साथ बातचीत करनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद भी लेनी चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से आत्महत्या की रोकथाम और मोबाइल के उपयोग से संबंधित जानकारी ली। उन्होंने बच्चों को अभिभावकों को बताए बिना मोबाइल का उपयोग नहीं करने तथा अनजान लोगों से मोबाइल नंबर या फोटो साझा नहीं करने की सलाह दी।
रील अपलोड करने में बरतें सावधानी
साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया पर रील बनाकर अपलोड करने में सावधानी बरतने की समझाइश दी। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन सामग्री का दुरुपयोग हो सकता है, जिससे विशेषकर लड़कियों के सामने गंभीर परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। विद्यार्थियों से अनावश्यक खर्च से बचने और पढ़ाई का मानसिक दबाव नहीं लेने की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि विषम परिस्थितियों में परिवार, शिक्षक या पुलिस को खुलकर अपनी समस्या बताएं।
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आत्महत्या की रोकथाम सामूहिक जिम्मेदारी
राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य मिशन के डॉ. बबलू साहू ने कहा कि आत्महत्या की रोकथाम केवल किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि परिवार, विद्यालय और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। बच्चों को यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि परेशानी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका समाधान निकाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि समस्या से बाहर निकलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
हेल्पलाइन नंबरों की दी जानकारी
आरकेएसके-एफपीएआई कार्यक्रम के परामर्शदाता अमित शर्मा ने विद्यार्थियों को उमंग हेल्पलाइन नंबर 14425, टेली-मानस हेल्पलाइन नंबर 14416 और डायल 112 की जानकारी दी। उन्होंने शिक्षकों से आग्रह किया कि वे बच्चों के साथ नियमित संवाद बनाए रखें और जरूरतमंद विद्यार्थियों को समय रहते उचित सहायता उपलब्ध कराएं।
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विद्यार्थियों ने साझा की जिज्ञासाएं और समस्याएं
कार्यशाला में प्रधानाचार्य अमिता श्रीवास्तव, शिक्षक सुदीप श्रीवास्तव, निर्मला सिंह तोमर, केके रिणवा और आरक्षक गौरव सिंह सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे। विद्यार्थियों ने अपनी जिज्ञासाएं और समस्याएं भी साझा कीं। कार्यक्रम के अंत में बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने, अपने मित्रों की भावनाओं को समझने तथा किसी भी गंभीर परेशानी की स्थिति में तुरंत माता-पिता, शिक्षक या किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करने का संदेश दिया गया।




















