रायपुर/बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादियों का नेटवर्क अब सिमटकर अपने अंतिम दौर में पहुंचता दिखाई दे रहा है। सुरक्षा बलों के लगातार अभियान, बड़े कैडरों के सरेंडर और संगठन के कमजोर होते ढांचे ने नक्सल गतिविधियों को कम कर दिया है। हालांकि, इसके बावजूद कुछ कट्टर माओवादी अब भी हथियार डालने को तैयार नहीं हैं और अंडरग्राउंड रहकर अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए हैं।
हाल के महीनों में कई बड़े माओवादी नेताओं के आत्मसमर्पण ने संगठन को बड़ा झटका दिया है। माओवादी कमांडर पापाराव ने जगदलपुर में और PLGA इंचार्ज सोढ़ी केसा ने तेलंगाना में आत्मसमर्पण किया, जिसके बाद बस्तर में सक्रिय माओवादियों की संख्या तेजी से घटी है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, अब बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर और कांकेर के सीमावर्ती इलाकों में गिनती के ही माओवादी बचे हैं।
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बस्तर के आईजी सुंदरराज पी ने मौजूदा हालात को देखते हुए माओवादियों को स्पष्ट चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अब बचे हुए माओवादियों के पास मुख्यधारा में लौटने का यह आखिरी मौका है। अगर वे अब भी आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो सुरक्षा बलों की कार्रवाई और ज्यादा आक्रामक और तेज होगी।
आईजी ने यह भी कहा कि सरकार की पुनर्वास नीति के तहत सरेंडर करने वाले माओवादियों को हर संभव सहायता दी जा रही है, ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें। लेकिन जो लोग अब भी हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई तय है।
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इधर तेलंगाना के डीजीपी शिवधर रेड्डी ने भी माओवादियों से हथियार छोड़ने की अपील की है। उन्होंने बताया कि साल 2024 में तेलंगाना मूल के करीब 125 लोग माओवादी संगठन से जुड़े थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर सिर्फ 5 रह गई है।
इन बचे हुए माओवादियों में कुछ बड़े नाम भी शामिल हैं। इनमें गणपति और कांकेर-नारायणपुर सीमा क्षेत्र में सक्रिय महिला माओवादी रूपी का नाम प्रमुख है, जो अब भी भूमिगत हैं और सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बने हुए हैं।
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बस्तर में माओवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। लगातार ऑपरेशन, स्थानीय समर्थन में कमी और आत्मसमर्पण की बढ़ती संख्या ने माओवादी संगठन को कमजोर कर दिया है।
फिर भी, आखिरी बचे कैडर अब भी आत्मसमर्पण और मुठभेड़ के बीच खड़े हैं। आने वाले समय में उनका फैसला ही तय करेगा कि वे मुख्यधारा में लौटकर नई शुरुआत करते हैं या फिर सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई का सामना करते हैं।