गाजा में बकरीद का हाल :जानवर ही नहीं बचे, महंगाई और जंग के बीच कुर्बानी बन गई नामुमकिन

गाजा में इस बार बकरीद की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। कभी जहां यह त्योहार खुशियों, नए कपड़ों, मिठाइयों और कुर्बानी की रौनक से भरा होता था, वहीं अब हालात इतने खराब हैं कि लोग सिर्फ जरूरत की चीजें भी खरीद पाने में असमर्थ हैं। युद्ध, लगातार बमबारी और महंगाई ने यहां की जिंदगी को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। 21 लाख की आबादी वाला गाजा आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, यहां की करीब 80 प्रतिशत इमारतें या तो क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं या पूरी तरह टूट चुकी हैं। ऐसे में बकरीद का त्योहार भी इस बार उत्सव नहीं, बल्कि संघर्ष की कहानी बन गया है।
"बाजार जाकर सिर्फ चीजें देखती हूं, खरीद नहीं पाती" – गाजा की नादिया अबू शमाला
गाजा में विस्थापित होकर रह रहीं 40 वर्षीय नादिया अबू शमाला ने एएफपी से बातचीत में अपने दर्द को साझा किया। उन्होंने कहा कि मैं बाजार सिर्फ देखने जाती हूं क्योंकि कुछ खरीद नहीं सकती। जब भी कीमत पूछती हूं, दिल टूट जाता है। नादिया ने बताया कि पहले बकरीद पर घरों में नए कपड़े, मिठाइयां और कुर्बानी की तैयारियां होती थीं, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि बच्चों की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। उन्होंने कहा कि अब वह खुशी नहीं रही जो पहले होती थी, अब सिर्फ डर और चिंता है।
महंगाई और भेड़ों की कमी ने बढ़ाया संकट
गाजा में इस समय कुर्बानी के जानवर भी बेहद कम रह गए हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, युद्ध से पहले जहां बड़ी संख्या में भेड़ें उपलब्ध थीं, अब उनकी संख्या घटकर करीब 15,000 रह गई है। गाजा के कृषि मंत्रालय के प्रवक्ता रफात असालिया ने बताया कि इस साल जानवरों की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। उन्होंने कहा कि जो भेड़ पहले 1,000 शेकेल में मिलती थी, अब उसकी कीमत 11,000 से 15,000 शेकेल तक पहुंच गई है।
स्थानीय नागरिक अहमद अबू सलेम ने कहा कि हमने जिंदगी में कभी इतनी महंगाई नहीं देखी। हम जैसे लोग अब अपने बच्चों के लिए एक किलो मांस भी नहीं खरीद सकते।
हम टेंट में रहकर बकरीद मना रहे हैं – विस्थापित परिवारों का दर्द
गाजा में हजारों परिवार इस समय टेंटों में रह रहे हैं। दक्षिण गाजा के खान यूनिस और डेयर अल-बलाह जैसे इलाकों में लोग अस्थायी आश्रयों में जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। नादिया अबू शमाला ने कहा कि हम अभी भी टेंट में रह रहे हैं। यहां कोई खुशी नहीं है, सिर्फ थकान, डर और चिंता है। उन्होंने बताया कि पहले जो मिठाइयां घर में बनती थीं, अब उन्हें बाजार से भी खरीदना मुश्किल हो गया है। अबू अहमद वाफी, जो अपने परिवार के साथ विस्थापित हैं, ने कहा कि गैस की कमी के कारण घर में खाना बनाना भी मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि पहले हम बकरीद पर घर में काक और मामूल बनाते थे, लेकिन अब न तो सामान है और न ही संसाधन।
भेड़ों की कीमत 15 गुना तक बढ़ी, कुर्बानी करना भी मुश्किल
गाजा में कुर्बानी के लिए जानवरों की भारी कमी देखी जा रही है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, युद्ध, चारे की कमी और सप्लाई बाधित होने की वजह से पशुपालन पूरी तरह प्रभावित हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जो परिवार हर साल कुर्बानी करता था, अब वह एक जानवर खरीदने की स्थिति में भी नहीं है। कई लोग अपने बच्चों को त्योहार का एहसास दिलाने के लिए छोटे स्तर पर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन संसाधनों की कमी हर कदम पर रुकावट बन रही है।
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खंडहरों के बीच उम्मीद की हल्की किरण
हालांकि हालात बेहद खराब हैं, फिर भी कुछ लोग उम्मीद नहीं छोड़ रहे हैं। विस्थापित परिवारों के बीच कुछ लोग सीमित संसाधनों में भी त्योहार मनाने की कोशिश कर रहे हैं। नादिया अबू शमाला ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि एक दिन हालात बदलेंगे और हम फिर से अपनी पुरानी जिंदगी जी सकेंगे।












