बैसाखी सिख धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पर्व होता है। यह एक त्योहार नहीं, बल्कि सिख धर्म के लोगों को नई उम्मीदों, खुशियों और नई शुरुआत का सुंदर संदेश देता है। यह दिन खेतों में लहराती फसलों की खुशी, मेहनत का फल और प्रकृति के आशीर्वाद का उत्सव होता है। जिसे हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है, लेकिन साल 2026 में बैसाखी 14 अप्रैल को मनाई जाएगी। बता दें कि बैसाखी का त्योहार आस्था, साहस और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक माना जाता है।
इसी दिन इतिहास में एक ऐसी घटना घटी थी, जिसने समाज को नई दिशा दी और लोगों के दिलों में एकता, समानता और धर्म के प्रति समर्पण की भावना को और मजबूत किया। दरअसल, साल 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। उस समय समाज में अन्याय और भेदभाव बहुत बढ़ गया था। गुरु जी ने एक ऐसे समाज की कल्पना की, जो निडर, समान और धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो। उन्होंने पंच प्यारों को अमृत पिलाकर खालसा पंथ की शुरुआत की और सभी सिखों को सिंह और कौर नाम देकर जाति-पांति का भेद-भाव खत्म करने का संदेश दिया।
बैसाखी सिखों के नए साल की शुरुआत भी मानी जाती है। यह दिन उनके लिए बहुत खास होता है, क्योंकि इसे सिख समुदाय के लोग अपने नए जन्म की तरह मानतें हैं। इस पर्व से उनहे समानता, साहस और एकता का संदेश मिलता है। साथ ही, किसानों के लिए यह फसल कटाई की खुशी का समय भी होता है।
बैसाखी के दिन गुरुद्वारों में ‘साहब का पाठ’ होता है और लंगर जैसे विशेष कार्यक्रम होते हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में इस दिन खास रौनक देखने को मिलती है, जहां हजारों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। इस दिन अमृत संचार (दीक्षा समारोह) भी होता है, जिसमें लोग खालसा पंथ में शामिल होकर सिख धर्म के नियमों को अपनाने का संकल्प लेते हैं।
पंजाब और अन्य जगहों पर लोग भांगड़ा और गिद्धा (लोक नृत्य) करते हैं। इसके साथ ही अलग-अलग जगहों पर मेले लगते हैं। शाम को लोग घर के बाहर लकड़ियां जलाकर उसके चारों ओर नाच-गाना करते हैं और एक-दूसरे को गले लगाकर शुभकामनाएं देते हैं।
बैसाखी हमें सिखाती है कि हर अंत के बाद एक नई शुरुआत होती है, हर मेहनत का फल मीठा होता है। हमें हमेशा सच्चाई, समानता और मानवता के रास्ते पर चलना चाहिए। यह पर्व न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि आगे बढ़ने और सकारात्मक ऊर्जा के साथ जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है।