रामचन्द्र पाण्डेय, भोपाल
आरोप है कि यहां भर्ती मेरिट के बजाय सिफारिश, रिश्तेदारी और प्रभावशाली लोगों के दम पर की गई और हाईकोर्ट में मामला लंबित होने के बावजूद 13 असिस्टेंट प्रोफेसरों को स्थायी कर दिया गया, जिससे पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं।
भोपाल का अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय एक बार फिर चर्चा में है इस बार चर्चाएं सिफारशी भर्तियों को लेकर हैं आरोप है कि यहां असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती चयन मेरिट के आधार पर नहीं बल्कि सिफारिश रिश्तेदारी और प्रभावशाली लोगों की पकड़ के दम पर की गई है, कई ऐसे नाम सामने आए हैं जिनका सीधा जुड़ाव अधिकारियों संगठनों और विश्वविद्यालय प्रबंधन से बताया जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन होने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने बिना किसी हिचक के इन 13 असिस्टेंट प्रोफेसरों की ट्रेनिंग समाप्त कर उन्हें स्थायी कर दिया। जिससे न केवल नियमों की अनदेखी के आरोप लगे हैं बल्कि पूरी भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता भी कठघरे में खड़ी हो गई है।
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सूत्रों के मुताबिक विश्वविद्यालय को असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर करीब 150 आवेदन मिले थे, जिनमें से केवल 25 उम्मीदवारों को योग्य ठहराया गया। हालांकि जब चयन सूची जारी हुई तो उसमें ऐसे नाम थे जो उच्च पदस्थ अधिकारियों सियासत और विश्वविद्यालय प्रबंधन से गहरे जुड़े थे। यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है कि आखिर योग्य उम्मीदवारों के होते हुए भी चयन सूची में ऐसे नाम कैसे शामिल हुए इससे यह भी संकेत मिलता है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही और कहीं न कहीं प्रभाव का इस्तेमाल हुआ है।
इसी भर्ती के विज्ञापन में दिव्यांगों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था जिसे बाद में दस्तावेजों में संशोधन कर जोड़ा गया पहले के विज्ञापन में एग्रीकल्चर और इंजीनियरिंग विषयों का जिक्र था लेकिन बाद में इन विषयों को हटाकर भाषा और चित्रकला जैसे विषय जोड़ दिए गए। यह बदलाव किसी ठोस वजह से था या फिर किसी और कारण से ये सवाल तो अब हर किसी के मन में है इस तरह के बदलावों ने पूरी भर्ती प्रक्रिया को और अधिक संदिग्ध बना दिया है, और इस पर गंभीर जांच की मांग उठने लगी है।
बताया जा रहा है कि कार्यपरिषद ईसी के कई सदस्यों का कार्यकाल खत्म होने वाला था और नई ईसी इन नियुक्तियों पर सवाल उठा सकती थी इसी डर से जल्दी जल्दी इन 13 प्रोफेसरों को स्थायी कर दिया गया। ताकि अगर कोई नई ईसी आती भी है तो वह इस फैसले को पलटने की स्थिति में न हो। हाईकोर्ट में यह मामला लटका हुआ है लेकिन विश्वविद्यालय के फैसले ने उसकी साख पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं, और यह मामला अब और ज्यादा विवादों में घिर गया है।
इन नियुक्तियों पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल। डॉ. गौरव गुप्ता हिंदी विभाग गाइड धर्मेंद्र पारे ईसी सदस्य मुकेश मिश्रा के परिचित। डॉ. विजय मिश्रा भौतिकी विभाग विद्यार्थी परिषद के पूर्व महाकौशल प्रांत अध्यक्ष, डॉ. चित्रलेखा कढेल वनस्पति विज्ञान अशोक कढेल की पत्नी शिक्षा उत्थान न्यास के क्षेत्र प्रमुख, डॉ. रश्मि चतुर्वेदी शिक्षा विभाग पति धीरेंद्र चतुर्वेदी प्रज्ञा प्रवाह के प्रांत संयोजक, डॉ. जितेंद्र भावसार रसायन विज्ञान विज्ञान भारती के प्रांत सदस्य मध्य भारत, डॉ. झामलाल रशिया भूगोल विभाग कुलपति खेम सिंह के करीबी रिश्तेदार, डॉ. अमित सोनी चित्रकला विभाग विद्यार्थी परिषद मध्य भारत से जुड़े, डॉ. नीलम सिंह योग विभाग पति डॉ. शैलेंद्र सिंह सेवा भारती से जुड़े, डॉ. आशीष नवकासे अर्थशास्त्र विभाग कुलपति खेम सिंह के करीबी, डॉ. भावना खरे इतिहास विभाग पति डॉ. आर डेहरिया कुलपति के रिश्तेदार, डॉ. वंदना ठाकुर वाणिज्य विभाग छतरपुर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार यशवंत पटेल के जरिए चयन का आरोप, डॉ. भरत बाथम कम्प्यूटर विभाग संस्कृत भारती विश्वविद्यालय में नॉन टीचिंग पद पर रहकर पीएचडी पूरी की अनुमति के बिना। बता दें कि समाजसेवी राहुल रंजन ने इस पर तीखी टिप्पणी की है हिंदी विवि में हुई भर्ती में रोस्टर का पालन नहीं किया गया और विकलांग कोटे को दरकिनार किया गया।