हमारे राम:महानाट्य में रावण का किरदार निभा रहे आशुतोष राणा, कहा- राम को राजनीति नहीं आचरण के चश्मे से देखिए

हर्षित चौरसिया, जबलपुर। आशुतोष राणा इन दिनों देश-विदेश में चर्चित महानाट्य ‘हमारे राम’ में रावण की भूमिका निभा रहे हैं। रविवार को जबलपुर के तरंग ऑडिटोरियम में हुए मंचन के दौरान उन्होंने पीपुल्स समाचार से खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने राम के आदर्शों, समाज में उनकी प्रासंगिकता और मंच पर मिलने वाली आध्यात्मिक अनुभूति पर खुलकर बात की।
राम के चरण जितने पूजनीय, उनके आचरण उतने ही धारणीय
आशुतोष राणा ने कहा कि राम कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं बल्कि जीवन जीने की सीख है। उन्होंने कहा कि आज लोग भगवान राम के चरण तो पूजते हैं, लेकिन उनके आचरण को जीवन में अपनाने की जरूरत है। उनके मुताबिक अगर शक्ति के ऊपर मर्यादा और शील का नियंत्रण न हो तो वह विनाशकारी बन जाती है। राम हमें सिखाते हैं कि अगर हम बलवान हैं तो शीलवान भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज को केवल “राम को मानना” नहीं बल्कि राम की माननी भी चाहिए।
राम हर रिश्ते में मर्यादा का सर्वोच्च उदाहरण
राम के सबसे महत्वपूर्ण स्वरूप पर पूछे गए सवाल के जवाब में अभिनेता ने कहा कि राम को किसी एक रूप में बांधना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि राम पुत्र, भाई, मित्र, पति, राजा और यहां तक कि शत्रु के रूप में भी मर्यादा का सर्वोच्च उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि राम और रावण के संबंधों में भी कहीं अमर्यादा दिखाई नहीं देती।
राम के विचार आज भी उतने ही आधुनिक
युवा पीढ़ी और आधुनिकता के सवाल पर आशुतोष राणा ने कहा कि राम के विचारों को पुरातन मानना गलत है। उन्होंने कहा आज भी हर व्यक्ति एक आदर्श पुत्र, सच्चा मित्र और न्यायप्रिय शासक चाहता है। यही तो राम के विचार हैं। इसलिए राम आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि फिल्मों, नाटकों और किताबों में लगातार राम कथा का आना इसी बात का प्रमाण है कि समाज आज भी इन मूल्यों से जुड़ना चाहता है।
बिना आध्यात्मिक ऊर्जा के यह मंचन संभव नहीं
‘हमारे राम’ के मंचन के दौरान मिलने वाली अनुभूति को लेकर अभिनेता ने कहा कि यह केवल अभिनय नहीं, बल्कि साधना जैसा अनुभव है। उन्होंने बताया कि नाटक की शुरुआत आरती और पूजन से होती है जिसमें कलाकारों के साथ दर्शक भी शामिल होते हैं। इसी आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण महानाट्य के 472 शो सफलतापूर्वक हो पाए हैं। उन्होंने इसे अपने गुरु की कृपा बताते हुए कहा कि अब उनके काम में ही राम बस गए हैं।
ये भी पढ़ें: दमोह: मकान की खुदाई में निकले ब्रिटिश कालीन चांदी के सिक्के, मजदूर बोले- बाल्टी भरकर ले गया मालिक
रावण का प्रसंग सुनाते हुए हुए भावुक
नाटक के सबसे भावुक प्रसंग पर आशुतोष राणा ने कहा कि रावण का शिव पूजन वाला दृश्य बेहद प्रभावशाली है जहां वह अपने सिर काटकर भगवान शिव को अर्पित करता है। उन्होंने कहा कि राम द्वारा युद्ध से पहले रावण को ही यज्ञ का आचार्य बनाना और रावण का सहर्ष आशीर्वाद देना भारतीय संस्कृति की महानता को दर्शाता है।
राम को राजनीति नहीं, आचरण के चश्मे से देखिए
समाज और राजनीति में राम के नाम पर चल रही बहसों पर अभिनेता ने कहा कि राम को राजनीति के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। उन्होंने कहा जिस दिन समाज राम को आचरण के रूप में देखने लगेगा उसी दिन राजनीति अपने आप मर्यादित हो जाएगी। आशुतोष राणा ने कहा कि ‘हमारे राम’ का सबसे बड़ा संदेश यही है कि “राम किसी एक के नहीं सबके हैं।
ये भी पढ़ें: MP में जलसंकट पर सरकार अलर्ट! पेयजल विभागों की छुट्टियां रद्द, कलेक्टरों को रोज मॉनिटरिंग के निर्देश
मंच और जीवन दोनों में निभानी पड़ती है जिम्मेदारी
रामायण जैसे संवेदनशील विषय से जुड़ने पर बढ़ती जिम्मेदारी को लेकर अभिनेता ने कहा कि मंच पर और मंच के पीछे दोनों जगह कलाकारों को मर्यादा और शुचिता का ध्यान रखना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह दबाव नहीं बल्कि एक सात्विक जिम्मेदारी है, जिसे कलाकार पूरे सम्मान के साथ निभाते हैं।












