नरेंद्र सिंह, जबलपुर । देशभर में एलपीजी संकट के बीच जबलपुर जिले का छोटा सा गांव बंदरकोला ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गया है। बरगी के पास स्थित इस गांव के करीब 75 फीसदी घरों में रसोई बायोगैस से जलती है, जिससे यह गांव एलपीजी के संकट से लगभग अछूता है।
जिला मुख्यालय से करीब 35 किमी दूर बसे इस गांव में करीब 400 घर हैं और आबादी 2 हजार है। इनमें से अधिकतर परिवार गोबर से तैयार होने वाली बायोगैस का उपयोग कर भोजन बनाते हैं, जबकि बाकी घरों में लकड़ी या कंडों का उपयोग होता है। गांव में एलपीजी कनेक्शन बहुत कम घरों में हैं। यहां 2013 में बायोगैस की शुरुआत पूर्व सरपंच अजय पटेल ने अपने घर से की थी। उन्होंने घर के पीछे करीब 3 मीटर गहरा गड्ढा बनवाकर बायोगैस प्लांट तैयार किया, जिसमें गोबर और पानी मिलाकर गैस तैयार की जाती है। यह गैस पाइपलाइन के माध्यम से सीधे रसोई तक पहुंचती है और चूल्हा जलाने में उपयोग होती है। 2019 में अजय पटेल सरपंच बने तो इसमें तेजी आई। बंदरकोला गांव स्वच्छता के क्षेत्र में बेहतर काम के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुका है।

गांव में संचालित गोशाला में भी बायोगैस प्लांट लगाया गया है, जिससे आसपास के कुछ घरों तक गैस की आपूर्ति की जा रही है।
एक बायोगैस प्लांट लगाने में लगभग 10 से 12 हजार रुपये का खर्च आता है। गांव के कुछ गरीब परिवार यह खर्च वहन नहीं कर पाते, इसलिए उनके लिए जबलपुर के एक एनजीओ और शासन की सब्सिडी योजना के माध्यम से मदद उपलब्ध कराई गई है।
अजय पटेल, पूर्व सरपंच, बंदरकोला, बरगी
बॉयोगैस प्लांट लगाने के लिए पैसे नहीं थे। 2020 में सरपंचजी ने मदद करवाई, सब्सिडी भी मिल गई अब कितनी भी रसोई गैस जलाओ, कोई खर्च नहीं आता। हमारे गांव में एलपीजी कनेक्शन बहुत कम हैं।
उजयार सिंह कुड़ोपा, ग्रामीण