पीपुल्स संवाददाता, जबलपुर। महज 10 रुपए के कथित हेरफेर के आरोप में एक रेलवे टीटी को नौकरी से बर्खास्त करना आखिरकार विभाग को भारी पड़ गया। हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने सख्त रुख अपनाते हुए इस मामले में विजिलेंस विभाग द्वारा की गई विभागीय कार्रवाई को न सिर्फ अवैध ठहराया, बल्कि पूरी जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद न सिर्फ 24 साल बाद टीटी को इंसाफ मिला, बल्कि उनकी बहाली का रास्ता भी साफ हो गया।
घटना 4 जनवरी 2001 की है। श्रीधाम से जबलपुर के बीच ट्रेन में यात्रा कर रहे एक यात्री ने दावा किया कि उसको टीटी नारायण नायर ने 31 के बजाए 21 रुपए लौटाए। टीटी का दावा था कि उन्होंने 31 रुपए ही लौटाए हैं। इसी बीच विजिलेंस टीम ने ट्रेन में छापा मारा और 10 रुपए के विवाद की विभागीय जांच शुरू की। नारायण नायर द्वारा दिए गए जवाब पर विचार किए बिना ही विभागीय कार्रवाई के बाद 15 मार्च 2002 को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। इसके खिलाफ असिस्टेंट डिवीजनल रेलवे मैनेजर के समक्ष की गई अपील पर उनके खिलाफ कोई आरोप साबित नहीं पाए गए।
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इसके बाद भी न्याय न मिलने पर नारायण नायर ने केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) में मामला दाखिल किया। कैट ने 16 जुलाई 2024 को फैसला सुनाते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ जारी किए बर्खास्तगी के आदेशों को निरस्त कर दिया। इसके खिलाफ रेलवे ने यह अपील हाईकोर्ट में दाखिल की थी।
मामले पर हुई सुनवाई के दौरान टीटी नारायण नायर की ओर से अधिवक्ता आकाश चौधरी ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने पाया कि विजिलेंस की जांच में कई खामियां थीं। विभागीय जांच पूरी तरह पक्षपातपूर्ण और नियमों के खिलाफ थी। जांच अधिकारी ने ही अभियोजन की भूमिका निभाई, जो न्याय के मूल सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है। इतना ही नहीं, कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर भी नहीं दिया गया, जो अवैधानिक है। बेंच ने कैट के आदेश को सही ठहराते हुए रेलवे की ओर से दाखिल अपील खारिज कर दी।