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Wild Life In MP :90 के दशक में खत्म हुए वाइल्ड बफेलो फिर बनेंगे कान्हा नेशनल पार्क की रौनक 

डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिकों की स्टडी में पाया गया कि यहां माहौल अनुकूल, उनकी पसंदीदा घास साइटरस मौजूद
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90 के दशक में खत्म हुए वाइल्ड बफेलो फिर बनेंगे कान्हा नेशनल पार्क की रौनक 
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    हर्षित चौरसिया, जबलपुर। मध्य प्रदेश से 90 के दशक के बाद विलुप्त हो चुके वाइल्ड बफेलो (जंगली भैंसों को कान्हा नेशनल पार्क में दोबारा बसाने की तैयारी है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) देहरादून के वैज्ञानिकों द्वारा की गई स्टडी के बाद वन विभाग तैयारियों में जुटा है। डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट के अनुसार, कान्हा में वाइल्ड बफेलो के पुनर्स्थापन की बड़ी वजह यहां उनके पसंदीदा घास साइटरस का पाया जाना है। योजना के मुताबिक कान्हा में 50 वाइल्ड बफेलो को असम के कांजीरंगा नेशनल पार्क और मानस अभयारण्य से लाकर बसाया जाएगा। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी ने इस प्रोजेक्ट को अंतिम अनुमति दे दी है। प्रक्रिया 5 चरणों में पूरी होगी, हर चरण में 10 वाइल्ड बफेलो लाए जाएंगे। वन विभाग ने मार्च तक पहले चरण को पूरा करने का लक्ष्य रखा है। कान्हा की सुपखार रेंज में 150 हेक्टेयर क्षेत्र में बड़ा, सुरक्षित बाड़ा (बोमा) तैयार होगा।

    इसलिए जरूरी है फिर से बसाना

    वेटरनरी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ वाइल्ड लाइफ सेंटर में पदस्थ सीनियर बायोलॉजिस्ट डॉ. केपी सिंह ने बताया कि जंगली भैंसा फारेंज सक्सेशनल यानी जंगल में घास को सही आकार लाने में बड़ी भूमिका निभाता है। जब यह लंबी घास को चरता है तभी छोटे शाकाहारी वन्यजीव घास को अपना भोजन बना पाते हैं। डॉ. सिंह ने बताया कि1980 में कान्हा के बालाघाट जिले से लगे जंगलों में करीब 30-35 जंगली भैंसे थे।  डॉ. सिंह के मुताबिक, वाइल्ड बफेलो के कुनबे का नेतृत्व मादा करती है।  इन ब्रीडिंग की समस्या के चलते भैंसों के बच्चे जंगल में जीवत नहीं बचे। अच्छे साथी की तलाश में वाइल्ड बफेलो छत्तीसगढ़ और वहां से उड़ीसा की तरफ बढ़ गए।

    कान्हा का वातावरण अनुकूल

    कान्हा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर रविंद्र मणि त्रिपाठी का कहना है कि यह पहल वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की उस विस्तृत स्टडी पर आधारित है, जिसमें यह पुष्टि हुई थी कि यहां का माहौल वाइल्ड बफेलो के रहने और पनपने के लिए पूरी तरह अनुकूल है।

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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