नवीन यादव, इंदौर
पिछले 13 महीनों में करीब 22 लाख रुपए के बेडरोल गायब हो चुके हैं। सबसे ज्यादा मामले थर्ड एसी कोच से सामने आए हैं, जहां यात्रियों की संख्या अधिक होने के कारण निगरानी कमजोर पड़ जाती है और चोरी या लापरवाही के मामले बढ़ जाते हैं।
रेलवे सूत्रों के अनुसार बेडरोल गायब होने के मामलों में थर्ड एसी कोच सबसे आगे है, जहां यात्रियों की संख्या अधिक होने के कारण नियंत्रण बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। फर्स्ट और सेकंड एसी में सीमित यात्रियों के कारण निगरानी आसान रहती है, लेकिन थर्ड एसी में लगातार चढ़ने-उतरने वाले यात्रियों के बीच हर सीट पर नजर रखना संभव नहीं हो पाता है। इसी कारण यहां से चादर, कंबल, तकिया और नैपकिन जैसे सामान गायब होने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। यह स्थिति रेलवे के लिए चिंता का विषय बन गई है क्योंकि इससे न केवल आर्थिक नुकसान हो रहा है बल्कि सेवाओं की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है।
ये भी पढ़ें: इंदौर: डेली कॉलेज विवाद में नया मोड़, सोसायटी का पलटवार, एफआईआर वापस लेने से इनकार
कोच अटेंडरों का कहना है कि कई मामलों में यात्री अनजाने में बेडरोल अपने बैग में रख लेते हैं, लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी भी होती हैं जहां इसे जानबूझकर ले जाया जाता है। अटेंडरों के मुताबिक ट्रेन के टर्नअराउंड समय में हर सीट की जांच करना संभव नहीं होता, जिससे कई बार सामान वापस नहीं मिल पाता है। कई बार यात्रियों को याद दिलाने के बावजूद वे सामान लौटाने में लापरवाही करते हैं। इससे अटेंडरों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ जाता है और उन्हें जवाबदेही भी झेलनी पड़ती है। इस समस्या ने रेलवे स्टाफ के काम को और कठिन बना दिया है।
रेलवे के नियमों के अनुसार बेडरोल गायब होने पर संबंधित कोच अटेंडर पर जुर्माना लगाया जाता है और अगर किसी यात्री के पास रेलवे का सामान पाया जाता है तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकती है। हालांकि, सख्त नियम होने के बावजूद इनका प्रभावी पालन नहीं हो पा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कार्रवाई के उदाहरण सामने आए हैं, लेकिन लगातार बढ़ते मामलों से स्पष्ट है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं ढिलाई बनी हुई है। इससे यह सवाल भी उठता है कि निगरानी और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत है।
ये भी पढ़ें: कमजोर दिल वाले रहें दूर : ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई बेस्ट हॉरर फिल्म, जिसकी कहानी रोंगटे खड़े कर देगी
समस्या से निपटने के लिए रेलवे अब पारंपरिक कपड़े के हैंड टॉवल की जगह डिस्पोजेबल पेपर नैपकिन देने की तैयारी कर रहा है। यह कदम आंशिक राहत दे सकता है, लेकिन कंबल, चादर और तकिए जैसे बड़े सामान की सुरक्षा अब भी चुनौती बनी रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल छोटे बदलावों से समस्या पूरी तरह सॉल्व नहीं होगी, बल्कि निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा। इसके साथ ही यात्रियों में जिम्मेदारी की भावना बढ़ाने के लिए जागरूकता भी जरूरी है ताकि इस तरह के नुकसान को रोका जा सके।
राजधानी भोपाल में सफेद बेडशीट 3559, तकिया कवर 1850, कंबल 651 और तौलिया 599 गायब हुए हैं। इंदौर में बेडशीट 2321, पिलो कवर 1638, टॉवेल 4479, कंबल 3234 और तकिया 369 दर्ज किए गए हैं। ग्वालियर में बेडशीट 980, पिलो कवर 1100, टॉवेल 1970, कंबल 680 और तकिया 197 गायब हुए हैं। वहीं जबलपुर में कंबल 5500 और पिलो कवर 3500 की संख्या सामने आई है। यह आंकड़े समस्या की गंभीरता को साफ तौर पर दिखाते हैं और बताते हैं कि यह केवल एक शहर तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे क्षेत्र में फैल चुकी है।
रेलवे पीआरओ मुकेश कुमार के अनुसार अब डिस्पोजेबल पेपर नैपकिन देने की तैयारी की जा रही है ताकि छोटे स्तर पर होने वाली चोरी को रोका जा सके। वहीं सीनियर डीसीएम डॉ. मधुर वर्मा का कहना है कि यात्री नजर बचाकर कंबल और तकिया अपने सामान में छुपा लेते हैं, जिससे चोरी रोकना चुनौती बन जाता है। उन्होंने बताया कि अटेंडेंट लगातार प्रयास करते हैं लेकिन हर यात्री पर नजर रखना संभव नहीं होता।