भोपाल में सरकारी उपेक्षा के साथ-साथ लोगों का अपनी विरासत से घटता लगाव भी बड़ा कारण है। कहीं ऐतिहासिक इमारतों पर कब्जे हो रहे हैं, तो कहीं उन्हें तोड़कर नए निर्माण खड़े किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक आम आदमी इन धरोहरों से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ेगा, तब तक न संरक्षण संभव है और न ही शहर की पहचान मजबूत हो पाएगी। भोपाल में कई महल, झील, दरवाजे, मस्जिद, मंदिर, बाग बगीचे, छतरियां, बाजार, बावड़ियां हैं।
ताजमहल का निर्माण नवाब शाहजहां बेगम द्वारा 1871-1884 के बीच कराया गया था।
विशेषता : अपनी भव्य वास्तुकला के लिए जाना जाता है। 120 कमरों, शीश महल और सावन-भादों फव्वारे वाला यह परिसर ब्रिटिश, फ्रेंच और मुगल शैलियों का मिश्रण है।
वर्तमान स्थिति : अब इसका ज्यादातर हिस्सा खंडहर हो चुका है। हालांकि पिछले एक दशक से इसके एक हिस्से को संवारने का काम चल रहा है।

निर्माण : नवाब शाहजहां बेगम द्वारा 1898 में कराया गया था। नवाबी काल में सदर मंजिल नवाब का दरबार आयोजित होता था।
विशेषता : 126 साल पुरानी यह हेरिटेज इमारत वास्तुकला, नक्काशी के लिए जानी जाती है।
वर्तमान स्थिति : कई सालों तक यहां नगर निगम का मुख्यालय रहा। अब इसे एक लग्जरी हेरिटेज होटल में बदल दिया गया है।

निर्माण : शाहजहां बेगम ने पैलेस 1875 में बनाया था। यह अंग्रेजी के अक्षर एच के आकार का महल था, जो विशेष रूप से गर्मियों के लिए था।
विशेषता : गर्मियों में बेगम का दरबार इसी महल में लगता था। इंडियन, यूरोपियन और पर्शियन आर्किटेक्चर को मिलाकर बनाए गए। इसमें ऐसे वॉटर चैनल और फव्वारे थे, जो बिना किसी मशीन के पूरे महल में सर्कुलेट होते थे।
वर्तमान स्थिति : बदहाल है, इसकी मरम्मत ही नहीं की गई।

निर्माण :1820 ई. में बेगम कुदसिया ने बनवाया था। कुदसिया को गौहर बेगम के नाम से भी जाना जाता है, उन्हीं के नाम पर इसका नाम पड़ा।
विशेषता : नक्काशी के साथ ही इसकी दीवारों पर चमकीला पदार्थ (अभ्रक) भी लगाया गया था, जिससे मोमबत्तियों की रोशनी और अभ्रक की वजह से कमरा अंधेरे में भी जगमगाता रहता था।
वर्तमान स्थिति : पुरातत्व विभाग द्वारा इसकी देखरेख की जाती है। स्थिति इसलिए बेहतर हैं।

निर्माण : 18वीं शताब्दी की शुरुआत में भोपाल रियासत के संस्थापक दोस्त मोहम्मद खान ने यहां अपनी राजधानी बनाई थी।
विशेषता : यहां की इमारतें लाल बलुआ पत्थर, चूने और ककिया ईंटों से बनी हैं, जिनमें हिंदू और इस्लामी शैलियों का सुंदर संगम दिखता है।
वर्तमान स्थिति : वर्तमान में इसे जगदीशपुर के नाम से जाना जाता है। इसकी देखरेख भी पुरातत्व विभाग द्वारा की जाती है।

निर्माण : 1870 के दशक में नवाब शाहजहाँ बेगम द्वारा शुरू किया गया था। धन की कमी के कारण यह बहुत बाद में 1985 में पूरा हुआ।
विशेषता : यह मस्जिद इस्लामी और मुगल शैली में निर्मित की गई है। इस पर 3 बड़े गुंबद और 2 बड़ी मीनारें हैं। ये एशिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है।
वर्तमान स्थिति : इसकी देखरेख भी पुरातत्व विभाग द्वारा की जाती है। स्थिति बेहतर है।

निर्माण : 1871-1884 के बीच बेगम सुल्तानजहां ने बनवाया था। 'तीन मोहरे गेट' शाहजहांनाबाद इलाके में स्थित ताजमहल परिसर का प्राचीन प्रवेश द्वार है।
विशेषता : तीन माहरे गेट तीन सीढ़ी तालाब या मोतिया तालाब के पास का क्षेत्र है। इसमें तीन मेहराबदार रास्ते हैं।
वर्तमान स्थिति : हाल ही में इसकी मरम्मत की गई थी। एक दरवाजे का हिस्सा गिर गया था।

निर्माण : नवाब दोस्त मोहम्मद खान द्वारा 300 साल पहले बनवाया गया था। सबसे पुराने जीवित द्वारों में से एक है।
विशेषता : यह अपनी ऐतिहासिक वास्तुकला, भीड़भाड़ वाले पारंपरिक बाजार, और स्थानीय जीवनशैली के लिए जाना जाता है।
वर्तमान स्थिति : इसकी स्थिति जीर्ण-शीर्ण है। बावजूद इसके इसके आसपास अतिक्रमण हैं।

निर्माण : नवाब कुदसिया बेगम ने 1832-1857 में चौक बाजार में बनवाया था।
विशेषता : यह लाल पत्थरों से बनी, सोने के पानी चढ़े गुंबदों और दो ऊंची मीनारों वाली एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक जगह है। यह इस्लामी वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है और शहर की पुरानी संस्कृति का केंद्र है।
वर्तमान स्थिति : स्थानीय कमेटी द्वारा इसकी देखरेख की जाती है।

निर्माण : रानी कमलापति महल (18वीं सदी) छोटी और बड़ी झील के बीच स्थित एक ऐतिहासिक 'जल महल' है, जो लखौरी ईंटों से बना है।
विशेषता : यह 7 मंजिला (कुछ स्रोतों के अनुसार 2 मंजिला) इमारत अपनी वास्तुकला, कमल के आकार की कंगूरों, और झील के किनारे होने के कारण प्रसिद्ध है, जो रानी कमलापति की याद दिलाता है। गिन्नौरगढ़ के गोंड शासक निजाम शाह ने अपनी पत्नी रानी कमलापति के लिए इसे बनवाया था।
वर्तमान स्थिति : पुरातत्व विभाग की देखरेख में हैं।
बेनजीर पैलेस : गर्मियों में राजशाही इस जगह से चलती थी। यहां कभी गांधी जी ने सभा की थी, लेकिन अब पूरी तरह बर्बाद हो चुका है।
राहत मंजिल : अहमदाबाद पैलेस के पास मेहमानों के लिए राहत मंजिल का निर्माण किया गया जो अब पूरी तरह खत्म हो गई।
ताजमहल : आगरा के बाद देश का दूसरा ताजमहल पूरी तरह से खत्म। कई सालों से सहेजने की कोशिश की जा रही है। कभी कभार शूटिंग
तीन सीढ़ी तालाब : रखरखाव के अभाव में तीनो तालाब अतिक्रमण की चपेट में हैं। तालाब सीवेज पॉन्ड बनकर रह गए ।
हवामहल : सिर्फ नाम बचा
फतेहगढ़ : एक दीवार ही सलामत
परीबाजार : निजी स्वीमिंग पूल जिम तैयार
नजर महल : अतिक्रमण में तोड़ दिया गया
समरिस्तान : सिर्फ कागजों में ही नाम बचा
इन धरोहरों को बचाने के लिए सरकार के साथ शहरवासियों को जागरूक होना पड़ेगा। सरकार इमारत को संरक्षित कर देगी , लेकिन लोग फिर से अतिक्रमण कर लेंगे। जयपुर में ऐसा नहीं है। वहां कई साल पहले भवनों को गुलाबी रंगने का नियम बनाया तो लोगों ने इसे दिल से अपनाया। ऐसा जज्बा भोपाल को लोगों को भी दिखाना होगा।
नारायण व्यास, पद्मश्री, पुरातत्व विशेषज्ञ
सरकार ने शुरुआत से ध्यान नहीं दिया, कई ऐतिहासिक इमारतें पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। अब सरकार कुछ कदम उठा रही है, सदर मंजिल, गौहर मंजिल, शौकत महल, गोल घर तो नए सिरे से तैयार किया गया है। सिर्फ सरकार ही नहीं लोगों को भी इसके लिए आगे आना होगा।
अनस अली, सामाजिक कार्यकर्ता, हेरिटेज संरक्षण
यूनेस्को विश्व धरोहर दर्जा : 2019 में, जयपुर के ''परकोटा शहर'' को इसकी अनूठी वास्तुकला और नगर नियोजन के लिए यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था, जो संरक्षण प्रयासों की मान्यता है।
गुलाबी रंग की परंपरा : 1876 में प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत के लिए महाराजा राम सिंह द्वारा पूरे शहर को गुलाबी रंग में रंगवाया गया था। आज भी, शहर के पुराने हिस्से के निवासियों को कानूनन अपने घरों गुलाबी रंग करना पड़ता है।
सुनियोजित नगर वास्तुकला : विद्याधर भट्टाचार्य द्वारा डिजाइन किया गया यह शहर वैदिक वास्तुकला के सिद्धांतों पर आधारित है। परकोटे के भीतर की सीधी सड़कें, चौपड़ और एक समान मुखौटे को संरक्षित किया गया है।
स्मारकों का जीर्णोद्धार और रखरखाव : आमेर किला, हवा महल, जंतर-मंतर (2010 में यूनेस्को स्थल) और सिटी पैलेस जैसे प्रमुख स्थलों का पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा नियमित संरक्षण किया जाता है।
हेरिटेज वॉक और पर्यटन : शहर की विरासत को जनता तक पहुंचाने के लिए, ''हेरिटेज वॉक'' का आयोजन किया जाता है।
जीवित विरासत : सिटी पैलेस और पुरानी हवेलियों में आज भी शाही परिवार का निवास और कई कारीगरों के काम करने की जगह है। इससे संस्कृति जीवित है।