नई दिल्ली। देश में महिला आरक्षण को लेकर एक बार फिर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। एक ओर सरकार इसे महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे समय और मंशा के लिहाज से संदिग्ध मान रहा है। सोनिया गांधी ने अपने लेख के जरिए सरकार पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि, जिस तरह से संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है और जिन मुद्दों को इसमें शामिल किया जा रहा है, वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर चिंता पैदा करता है।
केंद्र सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया है, जिसमें महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन और अन्य संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा की संभावना जताई जा रही है। लेकिन इस सत्र के समय और एजेंडे को लेकर विपक्ष ने सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका आरोप है कि, सरकार इस सत्र के जरिए ऐसे अहम फैसले जल्दी में लेना चाहती है, जिन पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। खासतौर पर महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे विषयों को लेकर यह विवाद और गहरा हो गया है।
सोनिया गांधी ने अपने लेख में लिखा है कि, संसद का विशेष सत्र ऐसे समय में बुलाया गया है जब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है। उनके मुताबिक यह समय संयोग नहीं हो सकता और इससे यह संदेश जाता है कि सरकार राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री विपक्ष से समर्थन मांग रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि सत्र में कौन-कौन से प्रस्ताव लाए जाएंगे।
उन्होंने महिला आरक्षण को लेकर भी सरकार के रुख पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि, 2023 में पारित हुए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में साफ तौर पर कहा गया था कि इसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू किया जाएगा, लेकिन अब अचानक इसे 2029 से लागू करने की बात सामने आ रही है। इस बदलाव को उन्होंने सरकार का यू-टर्न बताया और पूछा कि इसमें 30 महीने की देरी क्यों हुई।
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सरकार की ओर से यह संकेत दिया गया है कि, अब महिला आरक्षण को लागू करने का समय आ गया है और इसके लिए जरूरी संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने सभी दलों के नेताओं को पत्र लिखकर इस कानून के समर्थन की अपील की है। सरकार का मानना है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और इसके लिए यह कदम जरूरी है।
इसी कड़ी में बीजेपी ने अपने सांसदों के लिए तीन लाइन का व्हिप जारी किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर पूरी तरह गंभीर है और चाहती है कि संसद में इसकी प्रक्रिया बिना किसी बाधा के आगे बढ़े।
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इस पूरे विवाद में सबसे अहम मुद्दा परिसीमन बनकर उभरा है। सोनिया गांधी का कहना है कि, असली चिंता महिला आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन है, जिसे लेकर सरकार ने अभी तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी है। परिसीमन का मतलब होता है जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण, जो सीधे तौर पर राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है।
उन्होंने आशंका जताई कि अगर यह प्रक्रिया बिना संतुलन के लागू की गई, तो उन राज्यों को नुकसान हो सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है। ऐसे में यह केवल गणितीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन जाता है, जिसका असर देश की संघीय व्यवस्था पर पड़ सकता है।
सोनिया गांधी ने सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि 2021 की जनगणना अब तक पूरी नहीं हो पाई है, जिससे कई योजनाओं का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। उनका कहना है कि जनगणना में देरी का सीधा असर गरीब और जरूरतमंद लोगों पर पड़ रहा है।
इसके साथ ही उन्होंने जाति जनगणना के मुद्दे को भी उठाया और कहा कि, सरकार इस विषय पर स्पष्ट रुख नहीं अपना रही है। उन्होंने उदाहरण दिया कि कुछ राज्यों ने कम समय में अपने स्तर पर सर्वे कर लिए हैं, ऐसे में केंद्र सरकार की देरी समझ से परे है।
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महिला आरक्षण के इस पूरे मुद्दे में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है, वह है OBC महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की मांग। सोनिया गांधी का कहना है कि जब शिक्षा और नौकरियों में OBC वर्ग को आरक्षण दिया जाता है, तो संसद और विधानसभाओं में भी उन्हें प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यह मांग लंबे समय से उठती रही है, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया है।
अगर वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो देश की संसद में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है। लोकसभा में कुल 541 सदस्यों में से 74 महिलाएं हैं, जो करीब 13.9 प्रतिशत है, जबकि राज्यसभा में 242 सदस्यों में से 41 महिलाएं हैं, जो लगभग 16.9 प्रतिशत है। यह आंकड़े दिखाते हैं कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में महिलाओं को अभी लंबा रास्ता तय करना है।
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सदन |
कुल सदस्य |
महिला सदस्य |
प्रतिशत |
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लोकसभा |
541 |
74 |
13.9% |
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राज्यसभा |
242 |
41 |
16.9% |
विपक्ष का कहना है कि, महिला आरक्षण का मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे लागू करने की प्रक्रिया पारदर्शी और लोकतांत्रिक होनी चाहिए। मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार से मांग की है कि, इस विषय पर पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए और सभी दलों की राय ली जाए। उनका यह भी कहना है कि अगर सरकार सच में महिला सशक्तिकरण चाहती है, तो इसे 2024 के चुनाव से ही लागू किया जाना चाहिए था।
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महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है, बल्कि पिछले कई दशकों से चर्चा में रहा है। इसकी शुरुआत 1996 में हुई थी, जब पहली बार यह विधेयक पेश किया गया था। इसके बाद कई बार इसे संसद में लाने की कोशिश हुई, लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से यह अटक गया। 2010 में यह राज्यसभा से पास हो गया, लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो सका और अंततः यह खत्म हो गया।
आखिरकार 2023 में नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में पेश किया और संसद के दोनों सदनों से पारित कराकर इसे कानून का रूप दे दिया।
यह मुद्दा अब केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह संवैधानिक प्रक्रिया, राज्यों के अधिकार और राजनीतिक संतुलन जैसे बड़े सवालों से जुड़ गया है। सरकार जहां इसे ऐतिहासिक सुधार के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला बता रहा है।
इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यही है कि, क्या इतने बड़े संवैधानिक बदलाव बिना व्यापक चर्चा के किए जाने चाहिए, या फिर इसके लिए सभी पक्षों की सहमति जरूरी है।