न्यूजीलैंड के खिलाड़ी क्यों पहनते है काली जर्सी :जानें क्या है कारण और कैसे मिली कीवी नाम से दुनियाभर में पहचान

स्पोर्ट्स डेस्क। महिला टी- 20 वर्ल्ड कप का आगाज 12 जून से हो चुका है टूर्नामेंट का खिताबी मुकाबला 5 जुलाई को खेला जाएगा। अक्सर कई देशों की क्रिकेट टीमें वन- डे और टी-20 मैचों के लिए अलग- अलग जर्सी में उतरती है। लेकिन क्रिकेट में एक टीम ऐसी भी है जो शुरू से लेकर अब तक वन-डे और टी- 20 में काली जर्सी में उतरती नजर आ रही है। लेकिन क्या इसकी कोई खास वजह है और अब तक टीम ने अपनी जर्सी में कोई बदलाव क्यों नहीं किया है।
1892 में हुई थी परंपरा की शुरुआत
न्यूजीलैंड में काली जर्सी की कहानी 1892 से शुरू होती है। इसी साल न्यूजीलैंड रग्बी फुटबॉल यूनियन का गठन हुआ था। जब राष्ट्रीय रग्बी टीम के लिए वर्दी चुनने का सवाल आया तो सर्वसम्मति से काले रंग को चुना गया। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, उस दौर में काले रंग का कपड़ा अन्य रंगों की तुलना में सस्ता और आसानी से उपलब्ध था। यही वजह थी कि टीम ने ब्लैक यूनिफॉर्म अपनाई। बाद में यह रंग केवल एक जर्सी नहीं, बल्कि न्यूजीलैंड की खेल संस्कृति का प्रतीक बन गया।

राष्ट्रीय ध्वज में भी नहीं शामिल है काला रंग
क्रिकेट हो, रग्बी, हॉकी या ओलंपिक खेल न्यूजीलैंड के खिलाड़ी मैदान पर अक्सर काली जर्सी में नजर आते हैं। दुनिया की ज्यादातर टीमें अपने राष्ट्रीय ध्वज के रंगों को जर्सी में शामिल करती हैं, लेकिन न्यूजीलैंड का मामला अलग है। दिलचस्प बात यह है कि देश के झंडे में काला रंग प्रमुख रूप से मौजूद नहीं है, फिर भी ब्लैक जर्सी उसकी सबसे बड़ी खेल पहचान बन चुकी है।
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‘ऑल ब्लैक्स’ ने दिलाई वैश्विक पहचान
न्यूजीलैंड की राष्ट्रीय रग्बी टीम न्यूजीलैंड नेशनल रग्बी फुटबॉल यूनियन टीम दुनिया भर में ऑल ब्लैक्स के नाम से मशहूर है। इस टीम की सफलता ने काली जर्सी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। समय के साथ अन्य खेलों की राष्ट्रीय टीमों ने भी इसी रंग को अपनाना शुरू कर दिया। आज ब्लैक जर्सी न्यूजीलैंड के खिलाड़ियों की एक अलग पहचान बन चुकी है। मैदान पर काली जर्सी देखते ही लोग समझ जाते हैं कि यह खिलाड़ी न्यूजीलैंड का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
1920 : पहली बार ब्लैक जर्सी में ओलिंपिक में उतरी टीम
साल 1920 में जब न्यूजीलैंड पहली बार ओलंपिक खेलों में उतरा, तब भी उसके एथलीट काली जर्सी पहनकर मैदान में पहुंचे थे। उस प्रतियोगिता में न्यूजीलैंड के खिलाड़ियों ने पदक भी जीते। इसके बाद ब्लैक जर्सी को और अधिक स्वीकार्यता मिली। शुरुआती दौर में कुछ खिलाड़ी ब्लैक टी-शर्ट के साथ सफेद शॉर्ट्स पहनते थे, लेकिन बाद में पूरी तरह काली वर्दी को मानक बना लिया गया।

क्रिकेट में भी ब्लैक कैप्स से मशहूर है टीम
न्यूजीलैंड की क्रिकेट टीम को ब्लैक कैप्स के नाम से जाना जाता है। टीम की जर्सी में समय-समय पर बदलाव हुए, लेकिन काला रंग उसकी पहचान बना रहा। यही वजह है कि आईसीसी टूर्नामेंटों में भी न्यूजीलैंड की टीम अक्सर ब्लैक थीम वाली जर्सी में नजर आती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि न्यूजीलैंड के लिए ब्लैक जर्सी अब सिर्फ एक खेल पोशाक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव, एकता और खेल परंपरा का प्रतीक बन चुकी है। करीब 130 साल पहले लिया गया एक फैसला आज न्यूजीलैंड की सबसे मजबूत खेल पहचान के रूप में दुनिया भर में जाना जाता है।
न्यूजीलैंड को क्यों कहा जाता है ‘कीवी’? जानें दिलचस्प कहानी
दुनिया में कई देशों के लोगों के लिए अलग-अलग उपनाम प्रचलित हैं, लेकिन न्यूजीलैंड के नागरिकों को कीवी कहे जाने की कहानी सबसे अनोखी मानी जाती है। आज "कीवी" शब्द केवल एक पक्षी का नाम नहीं, बल्कि न्यूजीलैंड की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा बन चुका है।
क्या है कीवी?
कीवी न्यूजीलैंड में पाया जाने वाला एक दुर्लभ, उड़ान भरने में असमर्थ पक्षी है। इसकी लंबी चोंच, छोटे पंख और रात्रिचर जीवनशैली इसे अन्य पक्षियों से अलग बनाती है। यह पक्षी केवल न्यूजीलैंड में पाया जाता है, इसलिए इसे देश की प्राकृतिक विरासत और राष्ट्रीय प्रतीक माना जाता है।

कैसे बना राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक?
19वीं शताब्दी के दौरान न्यूजीलैंड की कंपनियों और व्यापारिक संस्थानों ने अपने उत्पादों पर कीवी पक्षी की तस्वीर का इस्तेमाल शुरू किया। इसका उद्देश्य यह बताना था कि उत्पाद न्यूजीलैंड में बना है। धीरे-धीरे कीवी की छवि देश की पहचान बन गई और अखबारों के कार्टून तथा लोकप्रिय संस्कृति में भी इसका उपयोग बढ़ने लगा।
प्रथम विश्व युद्ध में मिला नया अर्थ
कीवी शब्द को सबसे ज्यादा लोकप्रियता प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मिली। उस समय विदेशों में तैनात न्यूजीलैंड के सैनिकों की वर्दी और सैन्य प्रतीकों पर कीवी पक्षी का चिन्ह लगाया जाता था। इसी वजह से दूसरे देशों के सैनिक न्यूजीलैंड के जवानों को "कीवी" कहकर बुलाने लगे।











