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विमेंस वर्ल्ड कप फाइनल :जब मैदान पर बेटियां तो क्रिकेट के दीवाने सितारे हौसला बढ़ाने क्यों नहीं पहुंचे स्टेडियम?

ये कैसा सपोर्ट : महिला विश्व कप के पहले हाफ में सेलेब्रिटी गायब रहे, दूसरे हाफ में कुछ चेहरे दिखे पर वो जुनून नहीं जो पुरुष मैचों में नजर आता है
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जब मैदान पर बेटियां तो  क्रिकेट के दीवाने सितारे हौसला बढ़ाने क्यों नहीं पहुंचे स्टेडियम?
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    मुंबई। महिला क्रिकेट विश्वकप के फाइनल मुकाबले में मौजूद दर्शक दीर्घा ने एक बात साबित कर दी है कि खेलों में कितने ही कीर्तिमान रचने के बावजूद महिलाओं से भेदभाव अभी खत्म नहीं हुआ है। पुरुष क्रिकेट के साधारण मैच के मुकाबले विश्वकप का फाइनल मुकाबला खेल रही भारतीय बेटियों के समर्थन में मुंबई महानगरी में उदासीनता देखी गई। हद तो यह है कि बीसीसीआई ने महिलाओं के फाइनल मुकाबले के लिए मुंबई का प्रमुख स्टेडियम नहीं देते हुए डी वाय पाटिल स्टेडियम में यह मुकाबला रखा। आयोजकों का भी दोहरा चरित्र यहां देखने को मिला।

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    उद्योग, फिल्म और क्रिकेट जगत की हस्तियां गायब

    मुंबई में आयोजित महिला विश्व कप क्रिकेट के उद्घाटन मैच में दर्शक दीर्घा में एक चौंकाने वाली बात दिखी, जहां कैमरे आम तौर पर बॉलीवुड से लेकर बिजनेस जगत की चमक को कैद करते हैं, इस बार कुर्सियां पर उद्योग, फिल्म और क्रिकेट जगत की हस्तियां नजर नहीं आई। न कोई बड़े फिल्म स्टार, न टाटा और न ही आईपीएल के दौरान नजर आने वाले टीमों के ओनर न उनके समर्थक। न अन्य बड़े नाम। दिग्गज क्रिकेटर्स में भी सचिन तेंदुलकर और रोहित शर्मा मैदान पर नजर आए। हालांकि बाद में कुछ और क्रिकेटर मैदान पर पहुंचे लेकिन पुरुषों के लिए पलक पांवड़े बिछाने जैसा माहौल क्यों नहीं रहा, यह सवाल झकझोर देता है। सवाल यह भी है कि जब हमारी बेटियां मैदान में देश का नाम रोशन कर रही थीं, तब ग्लैमर जगत और कॉरपोरेट इंडिया कहां था? हालांकि बारिश की वजह से मैच देर से शुरू हुआ। जैसे-जैसे मैच आगे बढ़ा, कुछ सितारा दर्शक स्टेडियम पहुंच रहे थे। 

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    पुरुष टूर्नामेंट में पहुंचे थे ये

    जब पुरुषों का विश्व कप भारत में हुआ था — स्टेडियम में सितारों की भीड़ थी। शाहरुख खान, दीपिका पादुकोण, रणवीर सिंह, अमिताभ बच्चन, अजय देवगन से लेकर अंबानी परिवार, रतन टाटा, गौतम अडानी तक झ्र हर कोई अपनी मौजूदगी से खेल को त्योहार बना देता है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें, जश्न, और सेलेब्रिटी ट्वीट्स से माहौल सराबोर रहता है। 

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    महिलाओं के खेल के साथ यह फर्क क्यों?

    बड़ा सवाल यह है कि क्या महिलाओं के क्रिकेट को अभी भी ‘साइड शो’ की तरह देखा जाता है? वही देश जो ‘नारी शक्ति’ के नारे लगाता है, उसके प्रभावशाली वर्ग का ऐसा मौन क्या दर्शाता है कि हमें महिलाओं के खेल में उत्सव की भावना नहीं दिखती? महिला क्रिकेट की इस सबसे बड़ी स्पर्धा में मल्टीनेशनल कंपनियों ने भी कोई उत्साह नहीं दिखाया, जबकि पुरुषों के मुकाबलों के लिए ये ज्यादा उत्साह दिखाती हैं। 

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    प्रायोजक और दर्शक- एक मानसिकता का आईना

    पुरुष खिलाड़ियों के मैचों में कॉर्पोरेट जगत करोड़ों खर्च करता है, जबकि महिला टूर्नामेंट के टिकट तक कई बार मुफ्त बांटने पड़ते हैं। यह सिर्फ मार्केटिंग इश्यू नहीं, बल्कि मानसिकता की तस्वीर है, जहां विजिबिलिटी अभी भी जेंडर पर निर्भर करती है।

    शुक्र है... वर्तमान क्रिकेटर मैच देख रहे...

    हालांकि भारतीय बेटियों का मैच भारतीय क्रिकेट टीम के वर्तमान खिलाड़ियों ने आॅस्ट्रेलिया से देखा। बीसीसीआई ने एक्स पर एक तस्वीर जारी की है जिसमें अपना मैच समाप्त होने के बाद भारतीय पुरुष टीम के क्रिकेटर विमेन वर्ल्ड कप देखते हुए नजर आ रहे हैं।  भारत आज खेलों में महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश कर रहा है, लेकिन मैदान की चमक तभी पूरी होगी जब दर्शक दीर्घा में भी बराबरी दिखे। महिलाएं सिर्फ खेल नहीं रही हैं, वे मानसिकता बदल रही हैं। अब बारी है हमारे देखने के नजरिए की।

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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