पेट पर बाघ का चेहरा क्यों बनाते हैं कलाकार? क्या है इस अजीब दिखने वाली परंपरा की वजह?

त्रिशूर। केरल की पहचान सिर्फ समुद्र, हरियाली और खूबसूरत जगहों तक सीमित नहीं है। यहां की लोक परंपराएं भी लोगों का ध्यान खींचती हैं। ऐसी ही अनोखी परंपरा है पुलिकली, जिसमें कलाकार अपने शरीर को बाघ के रंगों में रंगकर सड़कों पर नाचते हैं। खासकर ओणम के समय त्रिशूर में इसका अलग ही माहौल देखने को मिलता है। कलाकारों के शरीर पर बाघ जैसी धारियां बनाई जाती हैं और ढोल की तेज आवाज के बीच वे बाघ की चाल और अंदाज की नकल करते हैं। इस दौरान सड़कें दर्शकों से भर जाती हैं और पूरा इलाका उत्सव के रंग में डूब जाता है।
पुलिकली का मतलब?
पुलिकली को आसान भाषा में बाघों का खेल कहा जा सकता है। मलयालम में ‘पुली’ का मतलब बाघ और ‘कली’ का अर्थ खेल होता है। इसे कुछ जगहों पर कडुवकली भी कहा जाता है। इसमें कलाकार बाघ या चीते का रूप लेकर लोक नृत्य करते हैं। इस प्रदर्शन के लिए किसी बड़े मंच की जरूरत नहीं होती। त्रिशूर की सड़कें ही कलाकारों का मंच बन जाती हैं। ढोल की ताल पर कलाकार उछलते, घूमते और बाघ जैसे हावभाव करते हैं। कई प्रदर्शनों में बाघ और शिकारी के बीच का दृश्य भी दिखाया जाता है।
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शरीर पर बाघ बनाना आसान काम नहीं
पुलिकली की सबसे खास बात कलाकारों का मेकअप है। शरीर पर पीले, काले और लाल रंगों से बाघ की धारियां और डिजाइन बनाए जाते हैं। चेहरे पर भी बाघ जैसा रूप तैयार किया जाता है। इस पूरी तैयारी में काफी समय और मेहनत लगती है। पेट भी इस कला का खास हिस्सा होता है। जब कलाकार ढोल की ताल पर शरीर को हिलाते हैं तो पेट पर बना बाघ का डिजाइन और भी जीवंत दिखाई देता है। यही वजह है कि पुलिकली को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
200 साल पुरानी परंपरा
त्रिशूर के पुलिकली को करीब 200 साल पुरानी लोक कला माना जाता है। इसका संबंध कोचीन के महाराजा राम वर्मा शक्तन थंपुरान के दौर से जोड़ा जाता है। समय के साथ यह परंपरा राजदरबार से निकलकर आम लोगों और स्थानीय कलाकारों का हिस्सा बन गई। आज पुलिकली त्रिशूर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। यह परंपरा किसी बंद संग्रहालय में नहीं बल्कि लोगों के बीच सड़कों पर आज भी जीवित है।
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ओणम के चौथे दिन दिखता है असली रंग
पुलिकली का सबसे बड़ा आयोजन ओणम के चौथे दिन त्रिशूर में होता है। ढोल, घंटियों और रंग-बिरंगे बाघ बने कलाकारों की टोली शहर में घूमती है। स्वराज राउंड इसका प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस दौरान चेंडा और दूसरे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की आवाज पूरे माहौल को उत्सव में बदल देती है। दर्शकों के लिए यह सिर्फ डांस देखने का मौका नहीं बल्कि केरल की पुरानी लोक संस्कृति को करीब से महसूस करने का अनुभव भी है।



















