मध्य-पूर्व में इन दिनों तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। इजरायल और अमेरिका को सबसे बड़ा डर यही है कि, कहीं ईरान परमाणु बम बनाने के लिए जरूरी स्तर तक यूरेनियम एनरिचमेंट न कर ले। इसी आशंका के चलते ईरान के परमाणु ठिकानों को लेकर लगातार निगरानी, आरोप-प्रत्यारोप और कार्रवाई की खबरें सामने आती रहती हैं।
दरअसल, यूरेनियम एनरिचमेंट एक ऐसी प्रक्रिया है जो तय करती है कि किसी देश का परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा उत्पादन तक सीमित रहेगा या हथियारों की दिशा में आगे बढ़ेगा। यही वजह है कि, यह मुद्दा सिर्फ विज्ञान तक सीमित नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा का सबसे संवेदनशील केंद्र बन चुका है। इस खबर में हम आपको सरल भाषा में समझाएंगे कि यूरेनियम एनरिचमेंट क्या है, कैसे काम करता है और क्यों इसे लेकर दुनिया में इतना बड़ा विवाद खड़ा होता है।
यूरेनियम एक भारी और रेडियोएक्टिव धातु (Metal) है, जो प्राकृतिक रूप से धरती में पाई जाती है। इसे खनन (Mining) के जरिए निकाला जाता है। खनन के बाद यह सीधे उपयोग में नहीं आता। पहले इसे प्रोसेस किया जाता है, जिससे यह ‘येलोकेक’ नाम के पीले पाउडर में बदल जाता है। यह असल में यूरेनियम ऑक्साइड होता है और आगे की प्रक्रिया के लिए बेसिक कच्चा माल है। यहीं से शुरू होती है यूरेनियम की असली प्रोसेस जिसका इस्तेमाल बिजली उत्पादन से लेकर परमाणु हथियार तक कहीं भी हो सकता है।

हर तत्व (Element) के अलग-अलग रूप होते हैं, जिन्हें आइसोटोप कहा जाता है। यूरेनियम के दो मुख्य आइसोटोप होते हैं-
Uranium-238 (लगभग 99.27%)
Uranium-235 (लगभग 0.72%)
इन दोनों में फर्क न्यूट्रॉन्स की संख्या का होता है, लेकिन यही छोटा सा फर्क इनके काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल देता है। U-235 खास इसलिए है क्योंकि यही परमाणु प्रतिक्रिया (nuclear reaction) को शुरू और बनाए रख सकता है। U-238 ऐसा नहीं कर पाता। यही वजह है कि पूरी दुनिया U-235 पर ध्यान देती है।

यूरेनियम एनरिचमेंट का मतलब प्राकृतिक यूरेनियम में मौजूद U-235 की मात्रा को बढ़ाना है। क्योंकि प्राकृतिक रूप में यह बहुत कम (0.7%) होता है, इसलिए इसे बढ़ाकर उपयोगी बनाया जाता है। जितना ज्यादा U-235 होगा, उतनी ज्यादा ऊर्जा निकलेगी और उतनी ही ज्यादा संभावित ताकत भी बढ़ेगी। यही प्रोसेस तय करती है कि इसका इस्तेमाल बिजली के लिए होगा या युद्ध के लिए।
यूरेनियम एनरिचमेंट का सबसे अहम हिस्सा है- सेंट्रीफ्यूज मशीनें। सबसे पहले यूरेनियम को गैस (UF₆) में बदला जाता है। फिर इसे बेलनाकार मशीनों (centrifuges) में डाला जाता है, जो बहुत तेज गति से घूमती हैं।
यह प्रक्रिया एक बार में पूरी नहीं होती। इसे सैकड़ों बार दोहराया जाता है, जिससे धीरे-धीरे U-235 की मात्रा बढ़ती जाती है। इसे ऐसे समझें जैसे दूध को मथकर मक्खन अलग किया जाता है।

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एनरिचमेंट स्तर |
उपयोग |
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3-5% |
परमाणु बिजली उत्पादन |
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20%+ |
हाई एनरिच्ड यूरेनियम |
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90%+ |
परमाणु हथियार |
दिलचस्प बात यह है कि, एक बार 60% तक पहुंचने के बाद 90% तक पहुंचना उतना मुश्किल नहीं रहता। यही कारण है कि, 60% एनरिचमेंट को भी गंभीर खतरे के रूप में देखा जाता है।

परमाणु बम का आधार है- न्यूक्लियर फिशन
जब U-235 के परमाणु पर न्यूट्रॉन टकराता है तो-
ये नए न्यूट्रॉन और परमाणुओं (Atoms) को तोड़ते हैं, जिससे चेन रिएक्शन बनती है।
अगर इस प्रक्रिया को नियंत्रण में रखा जाए, तो इससे सुरक्षित तरीके से बिजली बनाई जाती है। लेकिन जब यही प्रक्रिया काबू से बाहर हो जाए, तो बहुत तेज ऊर्जा निकलती है और बड़ा विस्फोट हो सकता है, जिसे परमाणु बम कहते हैं।

International Atomic Energy Agency के अनुसार, ईरान ने 60% तक एनरिच्ड यूरेनियम का बड़ा भंडार जमा किया है और 80% तक पहुंचने की क्षमता दिखाई है। यही वजह है कि, अमेरिका और इजरायल इसे लेकर सतर्क रहते हैं। हालांकि ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।
ईरान के प्रमुख परमाणु केंद्र हैं-
Natanz और Fordow में एनरिचमेंट होता है, जबकि Isfahan रॉ मैटेरियल तैयार करता है। इन साइट्स को नुकसान पहुंचाने का मतलब ईरान की परमाणु क्षमता को सीमित करना है।
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यूरेनियम एनरिचमेंट एक ड्यूल-यूज टेक्नोलॉजी है।
इसी वजह से यह तकनीक दुनिया की सबसे संवेदनशील तकनीकों में से एक मानी जाती है।

इस पूरी प्रक्रिया पर International Atomic Energy Agency नजर रखती है। यह संगठन देखता है कि देश परमाणु तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ शांति और अच्छे कामों के लिए करें, न कि हथियार बनाने के लिए।