वॉशिंगटन DC। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उठापटक के बीच अमेरिका ने बड़ा फैसला लिया है। रूस और ईरान से तेल खरीदने पर जो अस्थायी छूट दी गई थी, उसे अब आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। यह फैसला ऐसे समय आया है जब दुनिया पहले ही तेल की सप्लाई और कीमतों को लेकर दबाव में है।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने 15 अप्रैल को साफ कर दिया कि अब रूस और ईरान के तेल पर दी गई छूट खत्म हो रही है। उन्होंने कहा कि पहले जो तेल समुद्र में था या जहाजों में लदा हुआ था, उसे बेचने की अनुमति दी गई थी, लेकिन अब वह पूरा तेल इस्तेमाल या बिक चुका है।
उनका सीधा संदेश था अब कोई नई छूट नहीं मिलेगी। यानी अब जो देश इन दोनों देशों से तेल खरीदना चाहते हैं, उन्हें अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।
दरअसल, अमेरिका ने 12 मार्च को एक अस्थायी राहत दी थी। इस राहत के तहत भारत सहित कुछ देशों को पहले से लदे हुए रूसी तेल को खरीदने की अनुमति दी गई थी। यह छूट सिर्फ 30 दिन के लिए थी। इस फैसले के पीछे अमेरिका का मकसद था कि अचानक सप्लाई रुकने से वैश्विक बाजार में हड़कंप न मचे और तेल की कीमतें काबू में रहें।
फरवरी के आखिर में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ गया था। इसका सीधा असर तेल बाजार पर पड़ा और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं।
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ऐसे में अमेरिका ने हालात को संभालने के लिए यह अस्थायी छूट दी थी। इससे उन जहाजों को राहत मिली जो पहले से तेल लेकर समुद्र में थे। साथ ही, इससे बाजार में सप्लाई बनी रही और कीमतों में अचानक उछाल को रोका गया।
अब अमेरिका का कहना है कि जिस उद्देश्य से छूट दी गई थी, वह पूरा हो चुका है। बाजार में स्थिरता आ चुकी है और पुराना तेल भी खत्म हो गया है।
इसके अलावा, अमेरिकी नेताओं का मानना था कि इस छूट से रूस और ईरान को आर्थिक फायदा हो रहा था। इससे उन पर लगाया गया दबाव कम हो रहा था, जो अमेरिका की रणनीति के खिलाफ है। इसलिए अब अमेरिका ने सख्ती दिखाते हुए छूट को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया है।
इस पूरे मामले में भारत सबसे अहम रहा है। छूट मिलने के बाद भारत ने रूस से करीब 3 करोड़ बैरल तेल का ऑर्डर दिया था। भारत के लिए रूसी तेल सस्ता पड़ता है, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतें कम खर्च में पूरी होती हैं। लेकिन अब छूट खत्म होने के बाद भारत के सामने चुनौती बढ़ सकती है।
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अगर भारत रूस या ईरान से तेल खरीदता है, तो उसे अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा झेलना पड़ सकता है। ऐसे में भारत को अब दूसरे विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं, जो महंगे भी हो सकते हैं।
इस फैसले का असर सिर्फ भारत पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। तेल की सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है, कच्चे तेल की कीमतों में फिर उछाल आ सकता है और कई देशों के लिए ऊर्जा लागत बढ़ सकती है। हालांकि, यह भी संभव है कि कुछ देश वैकल्पिक सप्लाई चैन ढूंढ लें, लेकिन इसमें समय लगेगा और कीमतें स्थिर होने में देर हो सकती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या तेल की कीमतें फिर से आसमान छुएंगी? जानकारों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है और सप्लाई प्रभावित होती है, तो कीमतों में तेजी आ सकती है। वहीं, अगर अन्य देश उत्पादन बढ़ाते हैं, तो स्थिति कुछ हद तक संभल सकती है।