अमेरिका-ईरान तनाव का असर :कच्चा तेल 98 डॉलर के पार, भारत में महंगाई और ईंधन कीमतों पर बढ़ा दबाव

पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज उछाल दर्ज किया गया है। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब 4 फीसदी की बढ़त के साथ 98 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जो पिछले छह सप्ताह का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी लगभग 89.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल का स्तर भी पार कर सकती हैं। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा, जहां महंगाई, आयात बिल, रुपए की स्थिति और ईंधन कंपनियों की लागत पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।
लाल सागर में हमलों से बढ़ी बाजार की चिंता
तेल बाजार में आई तेजी की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते हालात हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यमन के हुती विद्रोहियों ने लाल सागर में सऊदी अरब के तेल टैंकरों को निशाना बनाया है। यह हमला बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर नाकेबंदी की घोषणा के अगले ही दिन हुआ। दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से वैश्विक ऑयल सप्लाई चेन प्रभावित होने की आशंका गहरा गई है। निवेशकों को डर है कि यदि तेल की आपूर्ति बाधित हुई तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में और तेजी आ सकती है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। आयात बिल बढ़ने से रुपए पर दबाव बढ़ सकता है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के प्रवाह पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है। इसके साथ ही महंगा कच्चा तेल सरकार और तेल विपणन कंपनियों के लिए भी चुनौती बन जाता है। यदि लंबे समय तक कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
तेल कंपनियों के मार्जिन पर बढ़ा दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर भी दिखाई देने लगा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा कीमतों पर डीजल की बिक्री में कंपनियों को प्रति लीटर लगभग 20.4 रुपए का नुकसान हो रहा है। शेयर बाजार में भी इसका असर देखने को मिला। हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) के शेयर करीब 2.5 प्रतिशत तक टूट गए। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOCL) के शेयरों में लगभग 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि भारत पेट्रोलियम (BPCL) के शेयर भी करीब 1 प्रतिशत कमजोर हुए। निवेशकों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो इन कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है।
कतर से LNG सप्लाई पर भी संकट के संकेत
तेल के साथ-साथ प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, QatarEnergy मिड-अक्टूबर तक लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के शिपमेंट पर लागू 'फोर्स मेज्योर' को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। कतर पहले ही एशिया और यूरोप के कई ग्राहकों को अगस्त और सितंबर के कार्गो रद्द होने की जानकारी दे चुका है। यदि यह स्थिति अक्टूबर तक बनी रहती है तो सर्दियों से पहले वैश्विक गैस बाजार में आपूर्ति का संकट और गहरा सकता है। ऐसे में यूरोप और एशियाई देशों के बीच सीमित LNG आपूर्ति को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज होने की संभावना है।
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मई में बढ़ चुके हैं पेट्रोल-डीजल के दाम
अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे कच्चे तेल का असर भारत में पहले भी देखा जा चुका है। मई महीने में इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) ने अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का हवाला देते हुए चरणबद्ध तरीके से पेट्रोल और डीजल दोनों के दाम 7.50-7.50 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ाए थे। देश के एक लाख से अधिक पेट्रोल पंपों में से करीब 90 प्रतिशत इन्हीं तीन सरकारी कंपनियों के नियंत्रण में हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों का असर सीधे घरेलू ईंधन बाजार पर दिखाई देता है।












