तेल, युद्ध और परमाणु कार्यक्रम…अमेरिका-ईरान डील की 14 शर्तों में किसे क्या मिला?

करीब 100 दिनों तक पश्चिम एशिया को अस्थिर करने वाली अमेरिका-ईरान जंग अब खत्म होने की ओर बढ़ती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम शांति समझौते (Peace Deal) पर 19 जून को हस्ताक्षर किए जाएंगे। इस घोषणा के बाद वैश्विक राजनीति, तेल बाजार और मध्य पूर्व के समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ डील अब पूरी हो गई है। वहीं, ईरान ने भी इस समझौते की पुष्टि करते हुए युद्ध को सोमवार को समाप्त घोषित करने की बात कही है।
यह संघर्ष 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद शुरू हुआ था। अब दोनों देशों के बीच सीजफायर, होर्मुज स्ट्रेट को खोलने और परमाणु कार्यक्रम पर नई बातचीत की दिशा में सहमति बनने का दावा किया जा रहा है।
पाकिस्तान ने सबसे पहले किया था डील का जिक्र
दिलचस्प बात यह है कि इस संभावित समझौते की जानकारी सबसे पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दी थी। इसके बाद ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि की। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कतर ने भी इस डील को अंतिम रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कतर का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल तेहरान में करीब 17 घंटे तक बातचीत कर समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश करता रहा।
ईरान को क्या मिलेगा?
प्रस्तावित समझौते में ईरान के लिए कई बड़े आर्थिक और रणनीतिक फायदे शामिल बताए जा रहे हैं।
ईरान के लिए संभावित फायदे
- तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात पर लगी पाबंदियां हटेंगी।
- फ्रीज किए गए 24 अरब डॉलर जारी किए जाएंगे।
- ईरान को अपने वित्तीय संसाधनों तक फिर से पहुंच मिलेगी।
- पुनर्निर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर की योजनाएं तैयार की जाएंगी।
- लेबनान समेत सभी मोर्चों पर स्थायी सीजफायर लागू होगा।
- ईरान की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में दखल न देने का वादा किया जाएगा।
- अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटेगी।
- अमेरिकी सेनाएं ईरान के आसपास के इलाकों से हटेंगी।
अमेरिका को क्या फायदा?
इस समझौते से अमेरिका को भी कई रणनीतिक लाभ मिलने की उम्मीद है।
अमेरिका के लिए संभावित फायदे
- ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकेगा।
- एक अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र समझौते के पालन पर नजर रखेगा।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के जरिए समझौते को वैधता मिलेगी।
- 60 दिनों की वार्ता प्रक्रिया में परमाणु मुद्दों पर आगे बातचीत होगी।
US-Iran डील की 14 अहम शर्तें
ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी के अनुसार, प्रस्तावित समझौते में 14 प्रमुख बिंदु शामिल हैं-
- ईरान के तेल, पेट्रोकेमिकल और संबंधित निर्यात पर लगी पाबंदियां हटेंगी।
- ईरान को अपने वित्तीय संसाधनों तक पूरा एक्सेस मिलेगा।
- 24 अरब डॉलर की फ्रीज संपत्तियां 60 दिनों में जारी की जाएंगी।
- अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर की योजनाएं पेश करेंगे।
- लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध स्थायी रूप से खत्म होगा।
- अमेरिका ईरान के मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा करेगा।
- 30 दिनों के भीतर नौसैनिक नाकेबंदी पूरी तरह हटाई जाएगी।
- अमेरिकी सेनाएं ईरान के आसपास के इलाकों से हटेंगी।
- होर्मुज स्ट्रेट 30 दिनों के भीतर फिर से खोला जाएगा।
- परमाणु मुद्दों पर अंतिम समझौते के लिए 60 दिनों की वार्ता शुरू होगी।
- ईरान परमाणु हथियार न बनाने की अपनी NPT प्रतिबद्धता दोहराएगा।
- बातचीत के दौरान अमेरिका नई पाबंदियां या सैन्य विस्तार नहीं करेगा।
- एक निगरानी तंत्र समझौते के कार्यान्वयन पर नजर रखेगा।
- ईरान का मिसाइल कार्यक्रम और प्रतिरोध समूहों को समर्थन इस समझौते के दायरे में नहीं होगा।
तीन चरणों में लागू होगा समझौता
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह शांति समझौता तीन चरणों में लागू किया जाएगा।
1. MoU की घोषणा
14 जून को युद्ध रोकने और नाकेबंदी हटाने की घोषणा।
2. 30 दिनों के अंदर
होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह खोला जाएगा। ईरान को फ्रीज फंड का पहला हिस्सा मिलेगा।
3. 60 दिनों की वार्ता
परमाणु कार्यक्रम पर आगे बातचीत होगी। बाकी फंड जारी किए जाएंगे। प्रतिबंधों और आर्थिक पुनर्निर्माण पर अंतिम समझौते की कोशिश होगी।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना अहम?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग माना जाता है। वैश्विक समुद्री तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। युद्ध के दौरान इस मार्ग के प्रभावित होने से दुनिया भर में तेल संकट और महंगाई का डर बढ़ गया था। अब इसके फिर से खुलने की संभावना से वैश्विक ऊर्जा बाजारों को बड़ी राहत मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे तेल की सप्लाई सामान्य होगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
तेल बाजार पर क्या असर पड़ा?
शांति समझौते की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली। निवेशकों को उम्मीद है कि, सप्लाई बाधित होने का खतरा कम हो जाएगा और मध्य पूर्व में स्थिरता लौटेगी। यह गिरावट तेल आयात करने वाले देशों, खासकर भारत, जापान और यूरोपीय देशों के लिए राहत की खबर मानी जा रही है।
कब होंगे समझौते पर हस्ताक्षर?
रिपोर्ट्स के अनुसार, समझौते पर हस्ताक्षर 19 जून को जेनेवा में हो सकते हैं। संभावित प्रतिनिधि-
अमेरिका: उपराष्ट्रपति जेडी वेंस
ईरान: विदेश मंत्री अब्बास अराघची और स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबफ
क्या इससे दुनिया को राहत मिलेगी?
इस समझौते को वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा मोड़ माना जा रहा है। अगर यह सफलतापूर्वक लागू होता है, तो इसके कई बड़े प्रभाव हो सकते हैं-
- मध्य पूर्व में तनाव कम होगा।
- तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है।
- वैश्विक शेयर बाजारों को राहत मिल सकती है।
- महंगाई पर दबाव घट सकता है।
- भारत सहित कई देशों को ऊर्जा सुरक्षा में फायदा हो सकता है।
भारत के लिए क्यों है अहम?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से तेल आयात करता है। ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमतें नीचे बनी रहती हैं, तो इससे-
- पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
- महंगाई को राहत मिल सकती है।
- आयात बिल घट सकता है।
- रुपए पर दबाव कम हो सकता है।
- LPG और अन्य ईंधन की कीमतों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
हालांकि, इसका सीधा फायदा कब और कितना मिलेगा, यह तेल कंपनियों और सरकार के फैसलों पर निर्भर करेगा।
शांति समझौते पर ईरान की प्रतिक्रिया
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने इस समझौते को MoU यानी समझौता ज्ञापन बताया है। ईरान ने कहा कि लंबे और कठिन वार्ताओं के बाद यह समझौता अंतिम रूप ले पाया है। ईरानी पक्ष का दावा है कि यह समझौता उसकी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों का सम्मान करता है।











