यूपी पंचायत चुनाव क्यों टले ?जानिए 2027 के बाद होने की बड़ी वजह

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा सियासी सस्पेंस बना हुआ है। पहले इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले "सेमीफाइनल" माना जा रहा था, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि पंचायत चुनाव 2027 के बाद ही होने की संभावना जताई जा रही है। इसकी वजह ओबीसी आयोग का गठन, आरक्षण की प्रक्रिया में लगने वाला समय और विधानसभा चुनाव का बढ़ता राजनीतिक माहौल बताया जा रहा है। इसी बीच सरकार ने फैसला लिया है कि ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें ही फिलहाल प्रशासक बना दिया जाएगा।
ओबीसी आयोग बना सबसे बड़ी वजह
पंचायत चुनाव में देरी की सबसे बड़ी वजह ओबीसी आरक्षण की प्रक्रिया को माना जा रहा है। योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के "ट्रिपल टेस्ट" नियम के तहत एक अलग से पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया है। इस आयोग की जिम्मेदारी एक रिटायर्ड हाईकोर्ट जज को दी गई है और इसमें कुल पांच सदस्य शामिल हैं। आयोग पूरे उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में जाकर सर्वे करेगा और पिछड़े वर्ग से जुड़ी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जानकारी जुटाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में करीब छह से नौ महीने का समय लग सकता है। इसके बाद रिपोर्ट तैयार होगी, जिसके आधार पर पंचायत सीटों का नया आरक्षण तय किया जाएगा और फिर वोटर लिस्ट भी अपडेट की जाएगी। सूत्रों के मुताबिक आयोग की रिपोर्ट नवंबर 2026 तक आने की संभावना है, जिसके बाद चुनाव प्रक्रिया शुरू होती है, लेकिन तब तक 2027 विधानसभा चुनाव का माहौल पूरी तरह बन चुका होगा।
ग्राम प्रधानों को बनाया गया प्रशासक
कार्यकाल खत्म होने से पहले ही सरकार ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का फैसला लिया है। 2021 में चुने गए 58,189 ग्राम प्रधानों का कार्यकाल मई 2026 में समाप्त हो रहा था। पहली बार ऐसा हुआ है कि ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक की जिम्मेदारी दी गई है। इससे पहले जब भी चुनाव में देरी होती थी, तब सहायक विकास अधिकारी को यह जिम्मेदारी दी जाती थी। हालांकि इस बार प्रधानों के पास नीतिगत फैसलों की शक्ति नहीं होगी और बड़े निर्णयों पर जिलाधिकारी की मंजूरी जरूरी होगी।
विधानसभा चुनाव बना सबसे बड़ा कारण
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत चुनाव को आगे बढ़ाने के पीछे सिर्फ कानूनी वजहें ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति भी है। मार्च 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए सरकार नहीं चाहती कि कोई ऐसा फैसला लिया जाए जिससे संगठन के अंदर नाराजगी या असंतोष बढ़े। विशेषज्ञों के अनुसार पंचायत चुनाव काफी कड़े मुकाबले वाले होते हैं। कई बार एक ही पार्टी के लोग एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, जिससे अंदरूनी टकराव की स्थिति बन जाती है। ऐसे में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह स्थिति किसी भी पार्टी के लिए नुकसानदायक हो सकती है। 2021 के पंचायत चुनाव में भी कई जिलों में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच जोरदार मुकाबला देखने को मिला था, जबकि कई जगह निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया था।
योगी सरकार ने क्यों कदम पीछे खींच लिए?
योगी सरकार अगर समय रहते हुए पंचायत चुनाव करा सकती थी. लेकिन ओबीसी आयोग के गठन में देरी किए जाने के चलते मामला फंस गया। कोर्ट के हस्ताक्षेत्र के बाद ही योगी सरकार ने ओबीसी आयोग का गठन किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनाव को टालने के पीछे सिर्फ कानूनी पेच नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सियासी रणनीति भी है। मार्च 2027 में उत्तर प्रदेश में सत्ता का 'महामुकाबला' यानी विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल विधानसभा के फाइनल से ठीक पहले पंचायत चुनाव का भारी जोखिम नहीं उठाना चाहती है।
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि पंचायत चुनाव के नतीजो को 2027 के चुनाव से जोड़ा जाता। साल 2021 के पंचायत चुनाव में बीजेपी को सपा से कड़ी टक्कर मिली थी और कई जिलों में निर्दलीयों का बोलबाला रहा था। योगी सरकार नहीं चाहती कि 2027 के मुख्य चुनाव से ऐन पहले किसी भी तरह का 'एंटी-इंकंबेंसी' या नकारात्मक संदेश जनता के बीच जाए। पंचायत चुनाव किसी पार्टी के सिंबल पर कम और स्थानीय रसूख, परिवार और चेहरे पर ज्यादा लड़े जाते हैं। एक-एक सीट पर बीजेपी या सपा के कई-कई कार्यकर्ता ताल ठोक देते हैं., अगर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले टिकट न मिलने पर कार्यकर्ता बागी हो गए, तो इसका सीधा नुकसान 2027 के मुख्य चुनाव में उठाना पड़ सकता है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पहले ही पंचायत चुनाव लड़ने से मना कर दिया था।












