आग, तिब्बती झंडा और विरोध...UN के बाहर शख्स ने क्यों किया आत्मदाह? अस्पताल में हुई मौत, 'China Out of Tibet' के मिले पर्चे

न्यूयॉर्क सिटी। अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय के बाहर गुरुवार को हुई एक दर्दनाक घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। एक 52 वर्षीय व्यक्ति ने तिब्बती झंडा हाथ में लेकर खुद पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगा ली। गंभीर रूप से झुलसे व्यक्ति को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। शुरुआती जांच में मामला राजनीतिक विरोध प्रदर्शन से जुड़ा माना जा रहा है, हालांकि पुलिस अभी सभी पहलुओं की जांच कर रही है।
UN मुख्यालय के बाहर क्या हुआ?
यह घटना गुरुवार शाम करीब 6:30 बजे न्यूयॉर्क के मैनहट्टन स्थित ईस्ट 42nd/43rd स्ट्रीट और फर्स्ट एवेन्यू के पास संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर हुई। प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आए वीडियो के मुताबिक, व्यक्ति ने पहले फुटपाथ पर तिब्बती झंडा रखा। इसके बाद उसने खुद पर ज्वलनशील पदार्थ छिड़का और आग लगा ली। कुछ ही सेकंड में वह आग की लपटों से घिर गया और एक मिनट से भी कम समय में सड़क पर गिर पड़ा। मौके पर मौजूद पुलिस और इमरजेंसी टीम ने तुरंत आग बुझाई और उसे अस्पताल पहुंचाया, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं सके।
NYPD ने क्या कहा?
न्यूयॉर्क पुलिस विभाग (NYPD) के मुताबिक, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि व्यक्ति ने आत्मदाह जैसा कदम क्यों उठाया। पुलिस मामले की हर पहलू से जांच कर रही है। अधिकारियों ने फिलहाल मृतक की आधिकारिक पहचान सार्वजनिक नहीं की है, क्योंकि पहले उसके परिजनों को सूचना देना जरूरी है।
UN ने क्या प्रतिक्रिया दी?
संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने बताया कि घटना उस समय हुई जब दिनभर की सभी आधिकारिक बैठकें समाप्त हो चुकी थीं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र के नियमित कामकाज पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
क्या मृतक की पहचान सामने आई है?
हालांकि पुलिस ने आधिकारिक तौर पर पहचान की पुष्टि नहीं की है, लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में मृतक के एक दोस्त के हवाले से उसका नाम लोबगा रांगजेन (Lobga Rangzen) बताया गया है। बताया जा रहा है कि, वह करीब 20 सालों से अमेरिका में रह रहा था, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
CCTV और वीडियो में क्या दिखा?
घटना के वीडियो और निगरानी कैमरों की फुटेज में व्यक्ति पारंपरिक बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहने दिखाई देता है। वीडियो के अनुसार उसने पहले तिब्बती झंडा जमीन पर रखा। फिर खुद पर ज्वलनशील पदार्थ डाला। इसके बाद खुद को आग लगा ली। कुछ ही क्षणों में वह सड़क पर गिर पड़ा। घटना के तुरंत बाद पूरे इलाके को सुरक्षा घेराबंदी में ले लिया गया।
'China Out of Tibet' लिखे पर्चे भी मिले
पुलिस जांच के दौरान घटनास्थल से 'China Out of Tibet' लिखे कई पर्चे भी बरामद हुए। इसी वजह से शुरुआती तौर पर माना जा रहा है कि यह घटना तिब्बत से जुड़े राजनीतिक विरोध प्रदर्शन का हिस्सा हो सकती है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
150 से ज्यादा तिब्बती कर चुके हैं आत्मदाह
तिब्बत मुद्दे पर आत्मदाह की घटनाएं नई नहीं हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2009 से अब तक 150 से अधिक तिब्बती आत्मदाह कर चुके हैं। इनमें बौद्ध भिक्षु, साध्वियां, छात्र, किसान और आम नागरिक शामिल रहे हैं। पहला चर्चित मामला फरवरी 2009 में सामने आया था, जब युवा भिक्षु तपे ने आत्मदाह किया। मार्च 2011 में किरती मठ के 21 वर्षीय भिक्षु फुंटसोग ने भी यही कदम उठाया। 2012 और 2013 में ऐसी घटनाएं सबसे अधिक दर्ज की गईं। 2014 के बाद चीन ने सुरक्षा और निगरानी बढ़ा दी, जिसके बाद आत्मदाह की घटनाओं में कमी आई।
आत्मदाह के पीछे तिब्बती संगठनों का क्या दावा है?
निर्वासित तिब्बती संगठनों का कहना है कि ऐसे विरोध प्रदर्शन चीन के शासन के खिलाफ नाराजगी जताने के लिए किए जाते हैं। उनकी प्रमुख मांगें हैं-
- दलाई लामा की तिब्बत वापसी
- धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता
- तिब्बती भाषा और पहचान की रक्षा
- अधिक स्वायत्तता
कई प्रदर्शनकारियों ने आत्मदाह से पहले तिब्बत को आजाद करो, दलाई लामा को वापस आने दो और चीन तिब्बत छोड़ो जैसे संदेश भी छोड़े हैं।
चीन का क्या कहना है?
चीन इन घटनाओं के लिए निर्वासित तिब्बती नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराता है। बीजिंग का आरोप है कि बाहरी संगठन लोगों को उकसाते हैं। वहीं निर्वासित तिब्बती प्रशासन इन आरोपों को खारिज करता है और कहता है कि लोग चीन की नीतियों और बढ़ते दबाव के कारण ऐसे कदम उठाने को मजबूर होते हैं।
क्या है पूरा तिब्बत विवाद?
तिब्बत विवाद चीन और तिब्बती समुदाय के बीच राजनीतिक अधिकार, शासन और सांस्कृतिक पहचान को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद है। चीन तिब्बत को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है, जबकि निर्वासित तिब्बती नेतृत्व का कहना है कि तिब्बत लंबे समय तक अलग प्रशासन और पहचान वाला क्षेत्र रहा। उनका आरोप है कि, 1950 में चीनी सेना के प्रवेश और 1951 के 17-पॉइंट समझौते के बाद चीन ने वहां नियंत्रण स्थापित किया।
चीन तिब्बत पर अपना दावा क्यों करता है?
चीन का कहना है कि, 13वीं शताब्दी के युआन राजवंश से तिब्बत चीन का हिस्सा रहा। 23 मई 1951 के 17-पॉइंट एग्रीमेंट के जरिए तिब्बत आधिकारिक रूप से चीन में शामिल हुआ। बीजिंग इसे Peaceful Liberation of Tibet यानी तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति कहता है। चीन का दावा है कि इसके बाद तिब्बत में सड़क, अस्पताल, शिक्षा और अन्य सुविधाओं का विकास हुआ।
तिब्बती समुदाय की मांग क्या है?
तिब्बती समुदाय का कहना है कि, 1912 में 13वें दलाई लामा ने तिब्बत को स्वतंत्र घोषित किया था। 1951 का समझौता दबाव में कराया गया था। इसलिए उसे वैध नहीं माना जा सकता। वर्तमान में दलाई लामा और निर्वासित तिब्बती नेतृत्व पूर्ण स्वतंत्रता के बजाय 'वास्तविक स्वायत्तता' की मांग करते हैं ताकि तिब्बती भाषा, संस्कृति, धर्म और स्थानीय प्रशासन सुरक्षित रह सके। हालांकि कुछ संगठन अब भी पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते हैं।
निर्वासित तिब्बती प्रशासन क्या है?
1959 में चीन के खिलाफ विद्रोह के बाद 14वें दलाई लामा भारत पहुंचे। इसके बाद हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में सेंट्रल टिबेटन एडमिनिस्ट्रेशन (CTA) की स्थापना हुई। इसे आम तौर पर निर्वासित तिब्बती सरकार कहा जाता है। यह संस्था दुनिया भर में रहने वाले तिब्बती शरणार्थियों के शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक मामलों का संचालन करती है। हालांकि भारत सहित कोई भी देश इसे संप्रभु सरकार के रूप में मान्यता नहीं देता।
क्या है भारत का रुख?
भारत आधिकारिक रूप से तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र को चीन का हिस्सा मानता है। साथ ही 1959 से भारत ने दलाई लामा और हजारों तिब्बती शरणार्थियों को मानवीय आधार पर शरण दी हुई है। भारत का कहना है कि, उसकी भूमि का इस्तेमाल चीन विरोधी राजनीतिक गतिविधियों के लिए नहीं होना चाहिए, लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की अनुमति है।
1959 में भारत कैसे पहुंचे थे दलाई लामा?
14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो 1959 में चीन के खिलाफ विद्रोह के दौरान तिब्बत छोड़कर भारत आए थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि चीनी सेना के पोताला महल तक पहुंचने के बाद गिरफ्तारी का खतरा बढ़ गया था। इसके बाद वे साधारण सैनिक का वेश धारण कर रात के अंधेरे में निकले और करीब दो सप्ताह तक पहाड़ों व गांवों से होते हुए भारत पहुंचे। 31 मार्च 1959 को वे तत्कालीन नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (आज का अरुणाचल प्रदेश) के रास्ते भारत पहुंचे। 3 अप्रैल 1959 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें भारत में राजनीतिक शरण देने की घोषणा की।
भारत में भी हुआ था विरोध
दलाई लामा को शरण देने के फैसले का उस समय कुछ नेताओं ने विरोध किया था। उनका तर्क था कि इससे चीन के साथ भारत के संबंध प्रभावित हो सकते हैं। इसके बावजूद भारत सरकार अपने फैसले पर कायम रही। भारत आने के बाद दलाई लामा पहले तेजपुर, फिर मसूरी और अंततः 1960 में धर्मशाला पहुंचे, जहां आज भी उनका निवास है।
14वें दलाई लामा के बारे में जानें
- पूरा नाम: तेनजिन ग्यात्सो
- जन्म: 6 जुलाई 1935
- वर्तमान आयु: 90 वर्ष
- 1959 से भारत में निवास
- 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित
- 65 से अधिक देशों की यात्रा
- 1959 के बाद से 85 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त











