ट्रंप को मिड टर्म में सेटबैक, इससे दुनिया को कई मुद्दों पर मिल सकती है राहत, जानें भारत पर क्या होगा असर

नई दिल्ली। अमेरिकी कांग्रेस में परिवर्तन का भारत पर सीधा असर पड़ सकता है, खासकर व्यापार, रक्षा और विदेश नीति के मोर्चे पर। सबसे पहला असर व्यापारिक नीतियों पर दिखेगा। डेमोक्रेट्स ट्रंप के आक्रामक टैरिफ और कड़े व्यापारिक फैसलों पर अधिक संसदीय जांच बैठा सकते हैं। इससे ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ेगा और भारत के साथ व्यापारिक समझौतों में उसे अधिक लचीला रुख अपनाना पड़ सकता है, जो भारतीय निर्यातकों के लिए राहत भरा हो सकता है। भारत-अमेरिका रक्षा और कूटनीतिक संबंध पूरी तरह द्विपक्षीय हैं। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स, दोनों ही दलों का भारत को समर्थन रहता है। इसलिए कांग्रेस में ट्रंप की ताकत कमजोर होने पर भी भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा, बल्कि यह निरंतरता बनी रहने की उम्मीद है। क्वाड और इंडो-पैसिफिक गठबंधन को लेकर अमेरिकी संसद में व्यापक सहमति है। डेमोक्रेटिक पार्टी चीन के खिलाफ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक गठजोड़ को बहुत जरूरी मानती है। ट्रंप की सत्ता पर अंकुश लगने से चीन को लेकर अमेरिकी विदेश नीति अधिक स्थिर और पूर्वानुमानित हो सकती है, जो भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए फायदेमंद है।
दुनिया भर में तेल की कीमतों पर नियंत्रण
पूरी दुनिया की नजर कच्चे तेल की कीमतों पर है। उम्मीद जताई जा रही है कि डेमोक्रेटिक कांग्रेस, राष्ट्रपति ट्रंप पर ईरान विवाद से पीछे हटने का दबाव डाल सकती है, जिससे तेल की कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, ऐसा होना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि अतीत में ट्रंप ने कांग्रेस की बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया है। इसके बजाय उन्होंने अपनी मर्जी चलाने के लिए कई कार्यकारी आदेशों (executive actions) और आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल किया है।
यह हो सकते हैं दबाव में रहने वाले सेक्टर
डेमोक्रेट्स को बड़ी जीत मिलती है तो फाइनेंशियल, एनर्जी और बड़ी टेक कंपनियों (Big Tech) के कुछ हिस्सों पर सबसे ज्यादा शुरुआती दबाव पड़ सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि डीरेगुलेशन, फॉसिल फ्यूल, AI और बड़ी टेक कंपनियों पर निगरानी और सख्ती बढ़ सकती है। साथ ही डेमोक्रेट्स की मजबूत जीत से यह जोखिम भी सामने आ सकता है कि 2028 के बाद लागू होने वाले ऊंचे टैक्स और कड़े नियम, समय से पहले ही लागू हो जाएं। हालांकि, परमिट और एनर्जी रेगुलेशन से जुड़े मामलों में ट्रंप के पास अभी भी काफी कार्यकारी शक्तियां बनी रहेंगी।
टैरिफ पर जांच कर सकती है डेमोक्रेटिक कांग्रेस
डेमोक्रेटिक कांग्रेस, ट्रंप की टैरिफ नीतियों की जांच-पड़ताल बढ़ाएगी और कानून के जरिए उनके लागू होने के तरीके को चुनौती भी दे सकती है। हालांकि, व्यापार नीति पर ट्रंप के पास काफी कार्यकारी अधिकार बने रहेंगे। इसका मतलब यह है कि टैरिफ को तुरंत वापस नहीं लिया जाएगा। जिन कंपनियों का संबंध ग्लोबल सप्लाई चेन, मैन्युफैक्चरिंग लागत और आयातित इनपुट से है उनके लिए यह एक महत्वपूर्ण पहलू है जिस पर नजर रखनी होगी।
AI और डेटा सेंटर
AI इंफ्रास्ट्रक्चर में आया उछाल एक और अहम क्षेत्र है। इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विस फर्म, मॉर्गन स्टेनली का मानना है कि AI में पूंजीगत व्यय (capex) और विस्तार का काम जारी रहेगा, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि डेटा सेंटर के विकास को आकार देने में अमेरिकी राज्य और स्थानीय सरकारों की भूमिका बड़ी होगी। अगर कांग्रेस बंटी हुई रहती है, तो इस सेक्टर के लिए एक संघीय नीतिगत ढांचा तैयार करना मुश्किल हो सकता है।
भारत पर असर
भारत के लिए, इसके परिणाम सीधे तौर पर बाजार से जुड़े होने के बजाय, भू-राजनीतिक (geopolitical) अधिक हो सकते हैं। यील्ड (yield), डॉलर या कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देश और घरेलू संपत्तियों के लिए फायदेमंद होगी। वहीं, अगर ट्रंप टैरिफ बढ़ाते हैं या भू-राजनीतिक अनिश्चितता और बढ़ती है, तो इससे दबाव बढ़ सकता है। अमेरिका के साथ भारत का व्यापार समझौता भी अभी तक सुलझ नहीं पाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी ठोस समझौते की संभावना उतनी ही कम है जितनी तीन महीने पहले थी। मध्यावधि चुनावों के नतीजों से भी इसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है। अमेरिकी डॉलर का कमजोर होना और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में कमी आना भारत के लिए सकारात्मक हो सकता है। इससे रुपये पर दबाव कम हो सकता है और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का भरोसा बढ़ सकता है। भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए सबसे अहम बात यह है कि यह जीत कितनी बड़ी है। इससे संकेत मिलता है कि 2028 में होने वाले अगले राष्ट्रपति चुनावों में प्रशासन में बदलाव देखने को मिल सकता है।
क्वाड और इंडो-पैसिफिक
डेमोक्रेटिक पार्टी और अमेरिकी संसद का एक बड़ा हिस्सा चीन के खिलाफ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक गठजोड़ (जैसे क्वाड) को बेहद जरूरी मानता है। ट्रंप की सत्ता पर अंकुश लगने से अमेरिकी विदेश नीति चीन के खिलाफ अधिक स्थिर व पूर्वानुमानित हो सकती है, जो भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए फायदेमंद है।




















