पुराने फैसले पलटे!15 साल पुरानी पंचायत नियुक्ति पर MP हाईकोर्ट का वार, दस्तावेजों की होगी दोबारा जांच

टीकमगढ़ जिले में पंचायत कर्मी की वर्ष 2011 की नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद अब हाईकोर्ट तक पहुंच गया, जहां अदालत ने मामले में बड़ा हस्तक्षेप करते हुए एसडीओ और एडिशनल कलेक्टर के पुराने आदेशों को रद्द कर दिया।
15 साल पुरानी पंचायत नियुक्ति पर MP हाईकोर्ट का वार, दस्तावेजों की होगी दोबारा जांच
Ai Generated
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    जबलपुर। टीकमगढ़ जिले में पंचायतकर्मी की नियुक्ति से जुड़ा एक पुराना विवाद अब एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्ष 2011 में हुई इस नियुक्ति को लेकर उठे सवालों पर हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए मामले को दोबारा जांच के लिए भेज दिया है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता और दस्तावेजों की सही जांच बेहद जरूरी है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी।

    यह भी पढ़ें: कटनी-शहडोल रेत खदान मामला: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सरकार के निर्णय को मिली मंजूरी

    क्या है पूरा विवाद

    यह मामला ग्राम पठा निवासी रामगोपाल नायक द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया था कि पंचायत कर्मी के पद पर हरीश चंद्र साहू की नियुक्ति नियमों के विपरीत की गई है। याचिकाकर्ता का दावा था कि नियुक्त व्यक्ति वास्तव में बड़ा मलेहरा का निवासी है, जबकि पंचायत पद के लिए स्थानीय निवासी होना जरूरी होता है।

    रामगोपाल नायक ने इस मुद्दे को लेकर पहले संबंधित SDO के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि, SDO ने 11 अप्रैल 2011 को उनकी शिकायत को खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने एडिशनल कलेक्टर के पास अपील की, लेकिन वहां भी 14 जुलाई 2011 को उनकी अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

    यह भी पढ़ें: सागर में दर्दनाक हादसा: चलती कार में लगी आग, डॉक्टर की पत्नी जिंदा जली; परिजनों को साजिश की आशंका

    कोर्ट में क्या हुआ तर्क?

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रभात कुमार असाटी ने अदालत के सामने मजबूत दलीलें रखीं। उन्होंने बताया कि राशन कार्ड और मूल निवासी प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज यह स्पष्ट करते हैं कि हरीश चंद्र साहू बड़ा मलेहरा के निवासी हैं। इसके बावजूद इन महत्वपूर्ण दस्तावेजों की अनदेखी की गई।

    याचिकाकर्ता का कहना था कि यदि दस्तावेजों का सही तरीके से सत्यापन किया गया होता, तो नियुक्ति को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान पहले ही हो सकता था। इस प्रकार की अनदेखी से प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

    हाईकोर्ट का फैसला और निर्देश

    मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस एमएस भट्टी की सिंगल बेंच ने SDO और एडिशनल कलेक्टर के पहले दिए गए आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले पर अब नए सिरे से विचार किया जाए।

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि दस्तावेजों का सत्यापन स्पष्ट रूप से नहीं हो पा रहा है, तो संबंधित SDO जांच करवा सकते हैं। यह जांच पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से की जानी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

    हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले के निपटारे के लिए 90 दिनों की समयसीमा निर्धारित की है। इसका मतलब है कि प्रशासन को तय समय के भीतर सभी दस्तावेजों की जांच कर निर्णय लेना होगा और प्रक्रिया को पूरा करना होगा।

    अब निगाहें SDO स्तर पर होने वाली नई जांच पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस मामले को किस तरह से आगे बढ़ाता है और क्या दस्तावेजों के आधार पर कोई स्पष्ट निष्कर्ष सामने आता है या नहीं।

    Garima Vishwakarma
    By Garima Vishwakarma

    गरिमा विश्वकर्मा | People’s Institute of Media Studies से B.Sc. Electronic Media की डिग्री | पत्रकार...Read More

    Latest Posts