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भोजशाला विवाद :पहले जैन मंदिर और गुरुकुल, बाद में बना ढांचा, कहा- प्रतिमा वाग्देवी की नहीं, जैन देवी अंबिका की

हाईकोर्ट में अंबिका देवी की प्रतिमा भारत लाने और नियमित पूजा की अनुमति की मांग, जैन पक्ष ने स्पष्ट किया कि जिस प्रतिमा को हिंदू समाज वाग्देवी के रूप में पूजता है, वह जैन धर्म की देवी अंबिका की है।
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पहले जैन मंदिर और गुरुकुल, बाद में बना ढांचा, कहा- प्रतिमा वाग्देवी की नहीं, जैन देवी अंबिका की

इंदौर। धार स्थित भोजशाला को लेकर चल रहे मामले में हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई के दौरान जैन पक्ष ने विस्तृत दावे और ऐतिहासिक तथ्य कोर्ट के सामने रखे। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका पर सुनवाई के दौरान सलेकचंद जैन (दिल्ली) की ओर से दायर याचिका में उनके अधिवक्ता दिनेश राजभर ने कहा कि वर्तमान भोजशाला परिसर मूल रूप से एक प्राचीन जैन गुरुकुल और देवी अंबिका का मंदिर था, जिसे बाद में नष्ट कर दिया गया।

अब तक 100 जनहित याचिकाएं दायर कीं

अधिवक्ता राजभर ने न्यायालय को बताया कि याचिकाकर्ता अब तक लगभग 100 जनहित याचिकाएं दायर कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां विभिन्न समाज के लोग एक साथ रहते हैं। यह विश्व में एक अनूठा उदाहरण है। जैन पक्ष ने स्पष्ट किया कि जिस प्रतिमा को हिंदू समाज वाग्देवी के रूप में पूजता है, वह वास्तव में जैन धर्म की देवी अंबिका की प्रतिमा है। उन्होंने बताया कि जैन धर्म में 24 तीर्थंकर होते हैं, जिनके अलग-अलग चिन्ह होते हैं। उदाहरण के तौर पर आदिनाथ के साथ बैल और महावीर के साथ शेर का चिन्ह जुड़ा होता है। सभी तीर्थंकरों की पहचान उनके आसन और प्रतीकों से की जाती है।

2003 के आदेश को चुनौती, अधिकारों के हनन का आरोप

अधिवक्ता ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि खुदाई में मिले शिलालेख, चिन्ह और अन्य साक्ष्य जैन तीर्थंकरों से जुड़े हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यहां जैन मंदिर था। सुनवाई के दौरान 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज की अनुमति दी गई थी। जैन पक्ष ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत मिले धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।

दावा- राजा भोज ने स्थापित की थी प्रतिमा

अधिवक्ता ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि संस्कृत विद्वान राजा भोज ने वर्ष 1034 ईस्वी में यहां जैन देवी अंबिका की प्रतिमा स्थापित की थी। यह प्रतिमा वर्ष 1875 में ब्रिटिश शासन के दौरान यहां से ले जाई गई और वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है।

वर्तमान संरचना में जैन वास्तुकला के प्रमाण

सुनवाई में 1881-82 की सरकारी रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उस रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि धार की मस्जिदें जैन अवशेषों और स्तंभों पर निर्मित की गई हैं। साथ ही माइकल विलेज और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मूर्ति प्रसाद तिवारी द्वारा लिखित पुस्तकों का भी हवाला दिया गया। जैन पक्ष ने कहा कि वर्तमान भोजशाला संरचना में जैन वास्तुकला, स्तंभ और जैन ह्यक्षेत्रपालह्ण (भैरव) की आकृतियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, जो जैन मंदिर होने के प्रमाण हैं।

अंबिका देवी की प्रतिमा वापस लाने की मांग

याचिकाकर्ता ने न्यायालय से मांग की है कि लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जैन देवी अंबिका की प्रतिमा को भारत वापस लाया जाए और भोजशाला के वास्तविक स्वरूप को जैन मंदिर के रूप में बहाल किया जाए। साथ ही जैन धर्मावलंबियों को वहां नियमित और निर्बाध पूजा-अर्चना की अनुमति दी जाए। मध्यप्रदेश सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 226 और 32 के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय के अधिकार व्यापक हैं और यहां मौलिक अधिकारों के साथ अन्य संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में भी सुनवाई की जा सकती है।

Puneet Pandey
By Puneet Pandey
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