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पुण्यतिथि पर विशेष : खनियाधाना में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के बमों के निशां आज भी हैं मौजूद

27 फरवरी का दिन महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के बलिदान की याद दिलाता है। शिवपुरी से आजाद का गहरा नाता रहा है। काकोरी कांड के बाद वे छद्म नाम से महीनों तक शिवपुरी जिले में रहे। चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि पर पढ़िए खास कहानी।
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खनियाधाना में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के बमों के निशां आज भी हैं मौजूद
खनियाधाना का गोविंद बिहारी मंदिर जहां आजाद छिपे थे
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    धर्मेंद्र श्रीवास्तव, शिवपुरी । 27 फरवरी का दिन महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के बलिदान की याद दिलाता है। आजाद के पूर्वज शिवपुरी जिले के खनियाधाना के पास छोटे से गांव बावरिया के रहने वाले थे। बाद में आजाद के पिता सीताराम तिवारी रोजगार की तलाश में भाबरा चले गए। वहां 23 जुलाई 1906 को आजाद का जन्म हुआ था। इसी कारण खनियाधाना को आजाद का पुश्तैनी क्षेत्र कहा जाता है। 

    गोविंद बिहारी मंदिर में रहे थे आजाद

    खनियाधाना रियासत ब्रिटिश शासन में भारत की एक रियासत थी, जो बुंदेला राजपूतों के जूदेव वंश द्वारा शासित थी। इसकी राजधानी खनियाधाना थी, यह आज शिवपुरी जिले में है। महाराजा खलक सिंह जूदेव 1947 में स्वतंत्रता से पहले खनियाधाना रियासत के शासक थे। 1925 में काकोरी कांड के बाद आजाद 6-7 महीने तक खनियाधाना के गोविंद बिहारी मंदिर में रहे। खलक सिंह जूदेव ने उन्हें मंदिर का पुजारी बनाकर छद्म नाम पं. हरिशंकर शर्मा दिया था। आजाद रात को मंदिर में आराम करते और दिन में 3 किमी दूर सीतापाठा मंदिर की पहाड़ी पर बमों की टेस्टिंग करते थे। बमों के निशान आज भी सीतापाठा की चट्टानों पर मौजूद हैं। हालांकि संरक्षण के अभाव ये निशान धीरे-धीरे आजाद मिट रहे हैं। आजाद ने वहां सिर्फ बमों का परिक्षण ही नहीं किया, बल्कि अपने कई क्रांतिकारी साथियों को गोली चलाने की ट्रेनिंग भी दी थी।

    चंद्रशेखर आजाद और खनियाधाना का रिश्ता

    खनियाधाना के इतिहासकार सुखनंदन चौबे के अनुसार, महाराजा खलक सिंह जूदेव की रोल्स रॉयस कार सर्विसिंग के लिए झांसी गई थी। सर्विसिंग के बाद बुंदेलखंड गैराज के मालिक अलाउद्दीन ने महाराजा के साथ एक मैकेनिक साथ भेजा, ताकि रास्ते में गाड़ी खराब होने पर उन्हें तकलीफ न हो। रास्ते में राजा साहब ने एक जगह गाड़ी रोकी और पेशाब करने चले गए, तभी झाड़ियों से एक सांप निकला। मैकेनिक की निगाह जैसे ही पड़ी, उसने अपने तमंचे से सटीक निशाना लगाते हुए सांप को मार दिया। राजा साहब के मन में संदेह हुआ। गाड़ी खनियाधाना के पास बसई गांव के रेस्ट हाउस पर रुकी, तो उन्होंने मैकेनिक से उसके बारे में पूछा। तब मैकेनिक ने काकोरी कांड का पूरा किस्सा सुनाते हुए बताया कि वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के चंद्रशेखर आजाद हैं।

    मूंछों पर ताव देती एकमात्र तस्वीर

    चंद्रशेखर आजाद की सिर्फ दो तस्वीरें मिलती हैं। एक में आधे नंगे बदन में मूंछों पर ताव देते हुए दिखते हैं। आजाद की ये तस्वीर खनियाधाना में ही बनाई गई थी। दरअसल, आजाद एक दिन गोविंद बिहारी मंदिर पर नहा कर आए थे। तब खनियाधाना के मम्माजू पेंटर ने उनकी ये तस्वीर बनाई थी। इस तस्वीर में आजाद की कमर में रौब से लटका उनका ‘बमतुल बुखारा’ यानी पिस्तौल दिखता है। ये पिस्तौल उन्हें खनियाधाना के महाराज खलक सिंह जूदेव ने दी थी। आजाद की शहादत के बाद उनकी ये बंदूक प्रयागराज के म्यूजियम में है।

    पिस्तौल की कहानी भी दिलचस्प

    महाराजा खलक सिंह जूदेव के पोते और पिछोर के पूर्व विधायक भानुप्रताप सिंह बताते हैं, आजाद ने अंग्रेजी पिस्तौल की इच्छा जताई। महाराजा ने एक जैसी दो रिवॉल्वर खरीदने का आदेश दिया। तब   वायसराय की अनुमति लेनी होती थी और खरीदने का कारण बताना होता था। महाराजा के पत्र पर रिवॉल्वर खरीदने की इजाजत मिल गई। एक जैसी गोलियों वाली दो रिवॉल्वर खरीदी गई। राज्य के शस्त्र रिकॉर्ड में आमद दर्ज होने के बाद महाराजा ने रोजनामचे में शिकार खेलने जाने की रवानगी डाली। दूसरे दिन लौटकर रोजनामचे में लिखा-शिकार खेलते समय रिवॉल्वर नदी में गिर गई। असल में वो रिवॉल्वर आजाद को सौंपी गई। आजाद ने रिवॉल्वर को कमर में बांधकर मूछों पर ताव देते हुए अपना फोटो खिंचवाया था। 

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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