Naresh Bhagoria
9 Jan 2026
Manisha Dhanwani
9 Jan 2026
नई दिल्ली। आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में दलीलें सुनने के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने मुद्दे में महिलाओं के बारे में की गई कुछ अपमानजनक टिप्पणियों के दावों पर भी विचार करने से इनकार कर दिया। हालांकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़ित इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज करा सकती हैं। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की विशेष पीठ ने पाया कि उसके समक्ष पेश की गईं कुछ दलीलें वास्तविकता से कोसों दूर थीं तथा आवारा कुत्तों द्वारा बच्चों और बुजुर्गों पर हमला करने के कई वीडियो हैं। कोर्ट उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें कुत्ता प्रेमियों द्वारा दायर याचिकाएं भी शामिल हैं, जिनमें पहले के आदेशों में संशोधन करने और निर्देशों का कड़ाई से पालन करने के लिए निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया तहै।
सीनियर एडवोकेट महालक्ष्मी पावनी ने कुत्तों को खाना खिलाने और उनकी देखभाल करने वाली महिलाओं की दशा का जिक्र किया और कहा कि कुत्तों को खाना खिलाने के खिलाफ कुछ समूहों ने इस मामले में पूर्व में पारित कोर्ट के आदेश को लागू करने का जिम्मा उठा लिया है। उन्होंने कहा, इसकी आड़ में वे महिलाओं को परेशान कर रहे हैं, उनके साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं और उनकी पिटाई कर रहे हैं। जस्टिस नाथ ने कहा, उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराइए। आपको कौन रोकता है? पीठ ने कहा कि यदि कोई महिलाओं को परेशान कर रहा है या उनके साथ छेड़छाड़ कर रहा है, तो यह अपराध है, और पीड़ित व्यक्ति प्राथमिकी दर्ज करा सकता है। पावनी ने कुत्ते को खाना खिलाने वाले पर अपने घर में हुए हमले की घटना का जब जिक्र किया, तो पीठ ने कहा, यह सब आपराधिक मामला है। आप इसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराएं।
जस्टिस नाथ ने कहा, हम ऐसे व्यक्तिगत मामलों को नहीं ले सकते, जहां कहीं कुछ गलत हो रहा हो। यह अदालत इसकी निगरानी नहीं करेगी। यह कानून-व्यवस्था का मामला है। पावनी ने कहा कि हरियाणा में कुछ सोसाइटियों ने कुत्तों को खाना खिलाने वालों को हटाने के लिए बाउंसर’ रखा है और गाजियाबाद में एक महिला को थप्पड़ मारा गया, लेकिन कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। पीठ ने कहा, हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। अगर कोई अपराध हुआ है, तो प्राथमिकी दर्ज कराई जाए। आपके पास प्रक्रियाएं उपलब्ध हैं, उपाय उपलब्ध हैं, और इसे दर्ज कराने के तरीके भी उपलब्ध हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कुत्तों के अनियमित प्रजनन और विदेशों से इन्हें मंगाये जाने के मुद्दे को उठाया। पीठ ने कहा, फिर से, इसका आवारा कुत्तों के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है। अधिनियम और नियमों में इसके लिए उपाय मौजूद हैं। इसे अन्य उद्देश्यों के लिए मंच न बनाएं। आप हमसे उन मुद्दों पर बात करें जिन पर हम इस मामले में विचार कर रहे हैं।
कोर्ट ने कहा कि उसके आदेश का सार स्पष्ट है और यह केवल आवारा कुत्तों तक ही सीमित है। जस्टिस मेहता ने कहा, कल आप पूछेंगे कि कुनो (राष्ट्रीय उद्यान) में चीतों को क्यों लाया गया है? स्थानीय नस्लों की देखभाल क्यों नहीं की जाती? हद हो गई। क्षमा करें। पावनी ने जब दलील दी कि इस मामले में महिलाओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां की जा रही हैं, तो पीठ ने कहा, इस संदर्भ में यह कैसे प्रासंगिक है? भले ही बेहद अपमानजनक भाषा में हमारी आलोचना की जा रही है, हम कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। हमने लोगों को इस तरह बोलने की कोई छूट नहीं दी है। अगर वे इस तरह बोल रहे हैं, तो आप उनके खिलाफ कार्रवाई करें।
मामले में पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी और शादान फरासत समेत अन्य वकीलों की दलीलें भी सुनीं। जब एक वकील ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एक कुत्ता दिखने का जिक्र किया, तो पीठ ने पूछा कि क्या उसे ऑपरेशन थिएटर तक भी ले जाया गया था। पीठ ने कहा, सड़क पर घूमने वाले हर कुत्ते में परजीवी होना स्वाभाविक है। और अगर किसी अस्पताल में परजीवी से संक्रमित कुत्ता हो, तो आप समझ सकते हैं कि इसके कितने भयावह परिणाम होंगे? कोर्ट ने कहा, एम्स में कुत्ते के होने को बढ़ा चढ़ा कर पेश करने की कोशिश न करें। सिंघवी ने कहा कि अब यह मामला पूरी तरह से कुत्तों या मनुष्यों का नहीं है, बल्कि कुछ संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ा है।
एक वकील ने कहा कि अगर अदालत देखना चाहे तो उसने वीडियो अपलोड कर दिए हैं। इस पर पीठ ने टिप्पणी की, कुत्तों द्वारा बुजुर्गों पर हमला करने के अनगिनत वीडियो यूट्यूब पर हैं। मामले की सुनवाई 13 जनवरी को भी जारी रहेगी। न्यायालय पिछले साल 28 जुलाई को लिये गए स्वतः संज्ञान वाले एक मामले की सुनवाई कर रहा है। यह मामला दिल्ली में आवारा कुत्तों के काटने से, विशेष रूप से बच्चों में, रेबीज फैलने की खबरों से संबंधित है।