चीफ मिनिस्टर का किस्सा :पटवा से विरोध पर सखलेचा ने बनाई मप्र जनता पार्टी, फिर इस शर्त पर लौटे कि कोई पद नहीं लूंगा

नरेश भगोरिया, भोपाल। वीरेंद्र कुमार सखलेचा का जन्म 4 मार्च 1930 को हुआ था। वे कम उम्र में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रभावित हुए और वर्ष 1945 में संघ से जुड़ गए। संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई। वे मूल रूप से मध्य प्रदेश के नीमच जिले (तत्कालीन मंदसौर जिला) के निवासी थे। वर्ष 2024 में नीमच स्थित एक सरकारी मेडिकल कॉलेज का नाम उनके सम्मान में रखा गया, जो उनके राजनीतिक योगदान की औपचारिक मान्यता मानी जाती है।
1962 में बने विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष
सखलेचा का राजनीतिक सफर भारतीय जनसंघ के साथ आगे बढ़ा। वर्ष 1962 में, जनसंघ के वरिष्ठ नेता कुशाभाऊ ठाकरे ने उन्हें मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त किया। उस समय 288 सदस्यीय विधानसभा में जनसंघ के 41 विधायक निर्वाचित हुए थे। यह नियुक्ति सखलेचा के राजनीतिक कौशल और संगठन क्षमता का प्रमाण थी, जिसने उन्हें प्रदेश की राजनीति में एक सशक्त चेहरा बना दिया।
उपमुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री तक का सफर
1967 में कांग्रेस के भीतर राजनीतिक उथल-पुथल के बीच गोविंद नारायण सिंह ने विजयराजे सिंधिया के साथ मिलकर विद्रोह किया और संयुक्त विधायक दल के समर्थन से सरकार बनाई। इस गठबंधन सरकार में सखलेचा को 30 जुलाई 1967 से 12 मार्च 1969 तक मध्य प्रदेश का उपमुख्यमंत्री बनाया गया। बाद में आपातकाल के दौरान उन्हें आंतरिक सुरक्षा कानून के तहत जेल भी जाना पड़ा। आपातकाल समाप्त होने के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और 18 जनवरी 1978 को वे मध्य प्रदेश के 10वें मुख्यमंत्री बने। वे 19 जनवरी 1980 तक इस पद पर रहे।
पटवा से राजनीतिक संघर्ष और अलग पार्टी
जनवरी 1980 में पार्टी नेतृत्व परिवर्तन के तहत सखलेचा को हटाकर सुंदर लाल पटवा को मुख्यमंत्री बनाया गया, हालांकि उनकी सरकार अल्पकालिक रही। आंतरिक मतभेदों के चलते सखलेचा ने नवगठित भारतीय जनता पार्टी छोड़कर ‘मध्य प्रदेश जनता पार्टी’ का गठन किया। वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस प्रत्याशी से पराजित हुए। उनकी पार्टी ने मालवा की कई सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन कोई प्रत्याशी जीत नहीं सका। बाद में 1990 में वे इस शर्त पर भाजपा में लौटे कि उन्हें कोई पद नहीं दिया जाएगा।
लखीराम अग्रवाल के खिलाफ अध्यक्ष का चुनाव
सखलेचा का पार्टी से कई बार मतभेद हुआ। 1990 में पार्टी में वापस आने पर उनके पुत्र को ओमप्रकाश सखलेचा को टिकट नहीं मिला तो पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। मप्र भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में उन्होंने लखीराम अग्रवाल के खिलाफ पर्चा भर दिया। हालांकि उन्हें 68 वोट ही मिल जबकि लखीराम को 123 वोट मिले। इस चुनाव में 132 प्रतिनिधि चुनाव में नहीं पहुंचे।
निर्दलीय चुनाव लड़ा और हार गए
1998 के विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने पर सखलेचा ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन वे पराजित हुए। 31 मई 1999 को उनका निधन हो गया। वीरेंद्र कुमार सखलेचा का राजनीतिक जीवन संघर्ष, वैचारिक प्रतिबद्धता और नेतृत्व क्षमता का प्रतीक माना जाता है। उनके निधन के बाद उनके पुत्र ओम प्रकाश सखलेचा ने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और भाजपा के टिकट पर कई चुनाव जीते। ओमप्रकाश सखलेचा शिवराज सिंह चौहान सरकार में एमएसएमई मंत्री रहे।












