प्यार करने पर जेल क्यों?सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग पर उठाए सवाल, पुलिस को दी बड़ी नसीहत

सुप्रीम कोर्ट ने प्रेमी जोड़ों के घर से भागने और आपसी सहमति से बने रिश्तों को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने सवाल उठाया कि अगर कोई युवक और युवती अपनी मर्जी से साथ रहना चाहते हैं, तो ऐसे मामलों में पुलिस पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई क्यों करती है?
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि कई बार माता-पिता अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा यानी ‘इज्जत’ के नाम पर प्रेमी जोड़ों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करा देते हैं। इसके बाद पुलिस बिना पूरी जांच किए पॉक्सो जैसे गंभीर कानून के तहत केस दर्ज कर देती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन शोषण और अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया है, लेकिन इसका इस्तेमाल प्रेम संबंधों या सहमति से बने रिश्तों के मामलों में सोच-समझकर किया जाना चाहिए।
नाबालिगों की निजता और अधिकारों पर SC की चिंता
यह मामला नाबालिगों के निजता के अधिकार से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की थी। अदालत ने कहा कि 15 से 18 साल की उम्र जीवन का बेहद संवेदनशील दौर होता है। इस उम्र में किशोर-किशोरियां भावनात्मक बदलावों से गुजरते हैं और कई बार अपने फैसले खुद लेने की कोशिश करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या हर ऐसे मामले में नाबालिगों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई करना सही है? अदालत ने कहा कि पुलिस को ऐसे मामलों में ज्यादा संवेदनशीलता दिखाने की जरूरत है। सिर्फ परिवार की शिकायत के आधार पर किसी युवक को अपराधी बना देना सही नहीं है। पुलिस को यह भी देखना चाहिए कि मामला वास्तव में यौन शोषण का है या फिर दो लोगों के आपसी रिश्ते का।
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पॉक्सो एक्ट का उद्देश्य बच्चों को बचाना
पॉक्सो यानी ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट’ साल 2012 में बनाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों, शोषण और उत्पीड़न से सुरक्षा देना है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून का इस्तेमाल उन मामलों में होना चाहिए जहां बच्चे के साथ जबरदस्ती, शोषण या अपराध हुआ हो। लेकिन कई मामलों में देखा गया है कि जब कोई नाबालिग लड़की अपनी मर्जी से किसी युवक के साथ चली जाती है तो परिवार की शिकायत पर युवक के खिलाफ पॉक्सो एक्ट लगा दिया जाता है। अदालत ने चिंता जताई कि ऐसे मामलों में कानून का गलत इस्तेमाल हो सकता है और इससे युवाओं का भविष्य प्रभावित होता है।
कोलकाता हाई कोर्ट के फैसले से शुरू हुआ मामला
यह मामला कोलकाता हाई कोर्ट के साल 2023 के एक फैसले से जुड़ा हुआ है। हाई कोर्ट ने एक मामले में टिप्पणी की थी कि लड़कों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और लड़कियों के साथ संबंधों में सावधानी बरतनी चाहिए। इस फैसले पर काफी विवाद हुआ था। बाद में साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को रद्द कर दिया था।इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के निजता के अधिकार को लेकर स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले की सुनवाई शुरू की। मामले की शुरुआत एक नाबालिग लड़की और 25 वर्षीय युवक के घर से चले जाने के बाद हुई थी। लड़की ने पुलिस कार्रवाई को अपनी निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया था।
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SC ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े किए। अदालत ने पूछा कि क्या पुलिस के पास अपहरण की शिकायत दर्ज कराई गई थी? क्या यौन शोषण की कोई शिकायत थी? कोर्ट ने कहा कि अगर लड़की अपनी इच्छा से अपने साथी के साथ रहना चाहती थी और दोनों का एक बच्चा भी है, तो ऐसे मामले में पॉक्सो एक्ट लगाने का आधार क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार 16 से 18 साल की उम्र के किशोर आपसी सहमति से रिश्तों में आ जाते हैं। जब परिवार इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करता तो वे घर छोड़ देते हैं। ऐसे मामलों में कई बार माता-पिता सामाजिक दबाव या अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए पुलिस में शिकायत कर देते हैं, जिसके बाद युवक पर गंभीर धाराओं में मामला दर्ज हो जाता है।
कानून के दुरुपयोग को रोकने की जरूरत- SC
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि पॉक्सो एक्ट और अन्य कानूनों के गलत इस्तेमाल को रोकने की जरूरत है। दलील दी गई कि कई बार आपसी सहमति से बने रिश्तों को भी पॉक्सो एक्ट के दायरे में लाकर युवकों को जेल भेज दिया जाता है। इससे उनका पूरा जीवन प्रभावित हो सकता है। अदालत ने माना कि बच्चों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन कानून का इस्तेमाल संतुलित तरीके से होना चाहिए।
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सहमति की उम्र 16 से बढ़ाकर 18 साल की
सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा हुई कि साल 2012 से पहले भारत में सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की उम्र 16 साल थी। पॉक्सो एक्ट लागू होने के बाद सहमति की उम्र को बढ़ाकर 18 साल कर दिया गया। इसका उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से बचाना था। हालांकि, समय के साथ ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां किशोरों के आपसी संबंधों को भी अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया।











