नई दिल्ली। बिहार में नई सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सत्ता के गलियारों में लगातार बैठकों और चर्चाओं का दौर जारी है। इसी कड़ी में आज मुख्यमंत्री आवास पर भाजपा और जदयू विधायकों की अहम बैठक बुलाई गई है। यह बैठक राज्य की राजनीति की दिशा तय करने वाली मानी जा रही है। खासतौर पर 14 अप्रैल को होने वाली भाजपा विधायकों की बैठक पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इससे यह साफ हो सकता है कि आगे सत्ता की कमान किसके हाथ में होगी।
नई सरकार के गठन की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। उन्हें बिहार में विधायक दल के नेता के चयन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेताओं के नाम चर्चा में जरूर हैं, लेकिन अब तक किसी नाम पर अंतिम मुहर नहीं लगी है। ऐसे में पर्यवेक्षक की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है, जो सहमति बनाने में निर्णायक साबित हो सकती है।
इधर, बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ले ली है। इसके बाद यह तय माना जा रहा है कि वे मुख्यमंत्री पद छोड़ने की तैयारी में हैं। उनके इस कदम के बाद राज्य की राजनीति में हलचल और तेज हो गई है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि उनके बाद मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाएगी।
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बिहार सरकार में मंत्री विजय कुमार चौधरी ने संकेत दिया है कि मुख्यमंत्री के नाम का फैसला अब भाजपा को करना है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि एनडीए के विधायक दल की बैठक में ही नेता का चयन होगा और वही मुख्यमंत्री बनेगा। इस प्रक्रिया में भाजपा की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। विजय चौधरी ने यह भी कहा कि भाजपा की अपनी आंतरिक प्रक्रिया होती है, जिसके बाद ही अंतिम नाम सामने आएगा।
नई सरकार के गठन को लेकर एनडीए के सभी सहयोगी दलों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन अभी तक मंत्रिमंडल को लेकर कोई चर्चा सामने नहीं आई है। विजय कुमार चौधरी ने संकेत दिया कि अगले कुछ दिनों में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। फिलहाल कयास लगाए जा रहे हैं कि इस बार मुख्यमंत्री भाजपा कोटे से और उपमुख्यमंत्री जदयू से हो सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में बड़ा फैसला सामने आने की उम्मीद है।