5 मार्च 1959… एक साधारण किसान परिवार में जन्मा बालक, जिसने आगे चलकर राजनीति की जमीन पर अपनी अलग पहचान गढ़ी। प्रेमसिंह और सुंदरबाई चौहान के घर जन्मे शिवराज सिंह चौहान आज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भरोसे का प्रतीक हैं। गांव की मिट्टी से उठकर प्रदेश की राजनीति के शीर्ष तक पहुंचने का यह सफर आसान नहीं था। छात्र राजनीति से शुरुआत, संगठन में सक्रिय भूमिका, फिर विधानसभा और लोकसभा की सीढ़ियां चढ़ते हुए उन्होंने अपनी अलग कार्यशैली बनाई।

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सबसे कम उम्र में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड हो या सबसे लंबे समय तक प्रदेश का नेतृत्व करने का अध्याय, शिवराज ने हर जिम्मेदारी को मिशन की तरह लिया। आज वे केंद्र में कृषि एवं ग्रामीण विकास जैसे अहम मंत्रालय संभाल रहे हैं, जहां उनका फोकस किसानों और गांवों की रीढ़ को मजबूत करने पर है।
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राजनीति में कई नेता पद से पहचाने जाते हैं, लेकिन शिवराज सिंह चौहान रिश्ते से पहचाने जाते हैं-‘मामा’। आमतौर पर मामा का अर्थ होता है ‘मां का भाई’, लेकिन शिवराज इसे एक भावनात्मक विस्तार देते हैं। उनका मानना है- जिसके दिल में बेटियों के लिए दो माताओं जितना स्नेह हो, वही सच्चा मामा है।

प्रदेश में बेटियों और महिलाओं के लिए चलाई गई योजनाओं ने इस रिश्ते को जन्म दिया। लाड़ली लक्ष्मी योजना ने हजारों परिवारों को बेटियों की शिक्षा और भविष्य के लिए आर्थिक संबल दिया। मुख्यमंत्री कन्यादान योजना ने गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह में सहारा दिया। महिलाओं के लिए आरक्षण और सुरक्षा की पहल ने भरोसा जगाया। धीरे-धीरे बालिकाओं ने उन्हें ‘मामा’ कहना शुरू किया। फिर युवाओं और बुजुर्गों तक यह संबोधन पहुंच गया। आज स्थिति यह है कि राजनीतिक मंच से लेकर गांव की चौपाल तक, हर जगह वे ‘मामा’ ही कहलाते हैं।
कहते हैं हर सफल व्यक्ति के पीछे एक मजबूत साथी होता है। शिवराज सिंह चौहान के जीवन में यह भूमिका उनकी धर्मपत्नी साधना सिंह ने निभाई। शादी की बात वे अक्सर टाल देते थे। परिवार समझाता रहा, लेकिन वे सार्वजनिक जीवन में इतने रमे थे कि निजी जीवन को प्राथमिकता नहीं दे पा रहे थे। यहां तक कि उनके पिता को छोटे भाई-बहन की शादी पहले करनी पड़ी।

राजनीति में जहां छवि अक्सर औपचारिकता से गढ़ी जाती है, वहां शिवराज की पहचान उनकी सहजता से बनी। गांव-गांव पदयात्राएं, चौपाल में बैठकर संवाद, बच्चों को दुलारना, बुजुर्गों के चरण छूना- यह सब उनके व्यवहार का हिस्सा रहा है। वे मंच से बड़े भाषण देने से ज्यादा लोगों से सीधे संवाद में विश्वास रखते हैं। शायद यही वजह है कि वे ‘पांव-पांव भैया’ भी कहलाए।

लंबा कार्यकाल अपने साथ चुनौतियां भी लाता है। शासन के दौरान कई बार विपक्ष ने उन पर सवाल उठाए, नीतियों की आलोचना हुई, चुनावी उतार-चढ़ाव आए। लेकिन उन्होंने हर चुनौती को राजनीतिक संघर्ष की तरह लिया। हार के बाद भी संगठन में सक्रिय रहना और फिर नई भूमिका में वापसी करना- यह उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत है।
केंद्र सरकार में कृषि और ग्रामीण विकास मंत्रालय संभालते हुए शिवराज सिंह चौहान की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। किसानों की आय, प्राकृतिक खेती, गांवों का बुनियादी ढांचा, स्वयं सहायता समूहों को मजबूती ये उनके एजेंडे में प्रमुख हैं। वे बार-बार कहते हैं कि गांव मजबूत होंगे तो देश मजबूत होगा। उनकी सोच में विकास केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने का लक्ष्य है।