Shankaracharya Interview :धार्मिक व्यवस्था में हस्तक्षेप का अधिकार न सरकार को है न कोर्ट को-शंकराचार्य सदानंद सरस्वती

द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती का मानना है कि धार्मिक व्यवस्था में हस्तक्षेप का अधिकार न तो सरकार और न ही कोर्ट को है। पीपुल्स समाचार के डिप्टी स्टेट एडिटर डॉ. राजीव अग्निहोत्री से विस्तृत बातचीत में उन्होंने विभिन्न मुद्दों पर बात की।उन्होंने कहा कि नेताओं के चक्कर में वही संत, जिन्हें आश्रम में मार्बल लगवाना है।
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धार्मिक व्यवस्था में हस्तक्षेप का अधिकार न सरकार को है न कोर्ट को-शंकराचार्य सदानंद सरस्वती
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती

डॉ. राजीव अग्निहोत्री, जबलपुर। द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती धार्मिक के साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं। वे बचपन से ही सनातन की शिक्षा देने और गो संरक्षण, देसी गोवंश वृद्धि के पक्षधर हैं। हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं में सरकार और न्यायालय के हस्तक्षेप का विरोध करते हैं। हाल ही में जबलपुर के मां बगलामुखी मंदिर स्थित उनके आश्रम में पीपुल्स समाचार ने चर्चा की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश...

सवाल : हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा- हिंदुओं को मंदिर जाने की जरूरत नहीं, घर में भी पूजा कर सकते हैं। क्या ऐसी टिप्पणी या धर्म में कोर्ट का हस्तक्षेप उचित है?

जवाब : धार्मिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का अधिकार न तो सरकार को है, न कोर्ट को है। कोई धार्मिक विवाद होने पर लोग कोर्ट जाते हैं, पर तब भी ऐसी टिप्पणियां स्वीकार्य नहीं हैं। हमारी सरकार धर्मनिरपेक्ष है और ऐसी सरकार धर्म के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। …और अगर कर सकती है तो अन्य धर्मों पर क्यों नहीं कर सकती। हमारे तो सभी बड़े मंदिर शासनाधीन हैं, क्या कोई मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा है, नहीं हैं। करने की हिम्मत ही नहीं है, तो हमारे साथ ही ऐसा भेदभाव क्यों? दरअसल स्वतंत्रता के बाद ही हिंदू कोड बिल लाकर हमारे तमाम अधिकारों को निरस्त कर दिया गया। हमारे मंदिरों का सोना-चांदी सरकार के अधीन है। सरकारें समय-समय पर लेती भी रही हैं। सरकार को चाहिए मंदिरों से होने वाली आय में से जो उनके सभी कार्यों के प्रबंधन के बाद बचे उसे कंपनियों की सीएसआर एक्टिविटी की तरह उसी जिले में अच्छी पाठशाला, गोशालाएं आदि बनाने और सनातन धर्म के कार्यों में खर्च करे। एक और बात- क्या कोई भी सरकार कभी किसी अमीर मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारों से सोना आदि ले पाई? नहीं।

सवाल : वर्तमान समय में हिंदू धर्म के सामने क्या चुनौतियां हैं?

जवाब : आधुनिकता के फेर में युवा पीढ़ी में धार्मिकता की कमी आ रही है। नास्तिक होना आधुनिक माना जाने लगा है। प्रारंभ से ही बच्चों को धर्म की शिक्षा दी जाए। इसी के अभाव में वे भटकते हैं। बच्चों को स्कूलों-कॉलेजों में ही धर्म की शिक्षा दी जाए,लेकिन आर्टिकल 30 और 30 ए हिंदुओं को धार्मिक शिक्षा देने से प्रतिबंधित करता है। जबकि मदरसे, मिशनरी और अन्य अल्पसंख्यक स्कूलों में तो उनके धर्म की शिक्षा दी जा रही है, तो हिंदुओं पर ही रोक क्यों? क्यों नहीं सरकारी स्कूल-कॉलेजों के सिलेबस में हिंदू धर्म की शिक्षा शुरू की जाती।

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सवाल : धर्म परिवर्तन पर क्या कहेंगे?

जवाब : हिंदुओं में यह तेजी से बढ़ रहा है, जो चिंता का विषय है। हम धर्म परिवर्तन करने वालों को राम नाम का जाप करा पुन: हिंदू धर्म से जोड़ रहे हैं। हमने झारखंड और गुजरात के टांकी जिले में 14 मंदिर बनवाए हैं। अभी और बन रहे हैं। गांव में हनुमान मंदिर देख धर्म परिवर्तन कराने वाले समझ जाते हैं, यहां दाल नहीं गलने वाली।

सवाल :  आप सेवा कार्य भी करते हैं?

जवाब :  हां, यह सब चलता रहता है। जैसे नरसिंहपुर में आश्रम के पास कोई स्कूल दूर-दूर तक नहीं था, वह गुरुजी ने खोला। एक चिकित्सालय है। वहां इलाजों के अलावा मात्र 70 रुपए में आंखों का ऑपरेशन होता है।

सवाल : आजकल चमत्कारी, अपचारी संतों की पूछ बढ़ गई है। क्या इससे हिंदू धर्म को नुकसान है?

जवाब : बहुत हो रहा है। लेकिन असली घी-दूध नकली घी-दूध की तरह असली-नकली संत की पहचान तो करनी पड़ेगी। असली संत घर-परिवार छोड़ सत्य की तलाश में रहता है, जबकि नकली संत सत्ता की करीबी पाने में। उन्हें सब तरह के सुख जो चाहिए, इसीलिए ऐसे संत सत्ता के अनुरूप चलते हैं। सत्ता के गुण गाने वाले हमारी संत परंपरा का अवमूल्यन कर रहे हैं। लेकिन अभी भी अच्छे, तपस्वी संत भी बहुत हैं। जो हिमालय, बद्रीनाथ, जूनागढ़, गंगा-नर्मदा के किनारे तपस्या करते हैं। सत्ता और सुख के चक्कर में नहीं पड़ते। नेताओं के चक्कर में वही संत आएंगे जिन्हें अपने आश्रमों में ग्रेनाइट-मार्बल, एसी लगवाना है।

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सवाल : सिंहस्थ आने वाला है, क्या सरकार को कोई सुझाव देंगे?

जवाब : सिंहस्थ को लेकर अखाड़ा परिषद के साथ तीन बार सरकार की बैठकें हो चुकी हैं। हमारे संपर्क में भी मप्र सरकार के लोग हैं। वो सलाह लेने हमारे पास भी आने वाले हैं। हम उन्हें सुझाव देंगे कि जो अव्यवस्थाएं पूर्व में हुई हैं, इस बार ना हों। सब संतों का यथोचित सम्मान रखा जाए। भक्त भी आराम से स्नान कर पुण्य लाभ पा सकें, यह सरकार की जिम्मेदारी है। हमारी जानकारी अनुसार मप्र सरकार ने वहां अभी से तेजी से काम करना शुरू कर दिया है। रोड, बिजली, पानी, महात्माओं के कैंप आदि का मास्टर प्लान भी तैयार हो चुका है। इस तरह हम यह कहेंगे कि मप्र सरकार इस दिशा में अच्छा काम कर रही है।

 सवाल : गोसंरक्षण और गंगा पर क्या पर्याप्त काम हो रहा है?

जवाब : गंगा को तो हमारे गुरुदेव ने राष्ट्रीय नदी घोषित कराया था। अब उसको बचाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर काम होना चाहिए। गोमाता की रक्षा होना चाहिए। हमारे गुरु भाई शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद इस दिशा में काम कर रहे हैं। चारों शंकराचार्यों ने भी इस पर सहमति जताई है। गोमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए। अभी तो पशु श्रेणी में मान वैसी ही गोशाला बन रही हैं। वो भी अपर्याप्त हैं, जिससे गोमाता सड़कों पर घूमने को मजबूर हैं। सरकार भी आवारा पशु मानती है। जब हम राष्ट्रीय पशु मान गोमाता कहेंगे तो उनके साथ ऐसा व्यवहार नहीं होगा, क्योंकि कोई मां-बाप का अपमान करता है क्या? गोमांस का विक्रय रुकेगा। हमारे पास तो पूरा गणित है कि गोमांस के विक्रय से जितना पैसा आता है उससे चार गुना ज्यादा धन गोमाता के संरक्षण से आएगा। हम लोग स्वयं भी कई गोशाला बना रहे हैं। गो संरक्षण और वृद्धि के लिए काम कर रहे हैं। आंदोलन कर रहे हैं, अभियान चलाते हैं। गो तस्करी रोकने हमने गोरक्षक दल बनाए हैं।

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सवाल : आपके नए गुरुकुलों में समय अनुरूप क्या पाठ्यक्रम में कोई परिवर्तन होगा, जैसे कंप्यूटर और एआई आदि?

जवाब : हमारे यहां दो तरह की परंपरा है। एक संस्कृत विश्वविद्यालय, जो सरकार से मान्यता प्राप्त हैं। इनमें गणित-विज्ञान सब पढ़ाते हैं। कंप्यूटर भी हैं, लैब भी। दूसरे हैं केवल संस्कृत और वैदिक विद्यालय। यहां वेद पाठ, नर्मदा पूजन, सत्यनारायण कथा सिखाते हैं। कर्मकांड, शादी-ब्याह, अन्य चीजें कैसे कराई जाती हैं, इसकी शिक्षा देते हैं। उनके माता-पिता को पहले ही बता दिया जाता है कि वैदिक विद्यालय में यह सिखाएंगे। यहां डॉक्टर-इंजीनियर नहीं बनते, वो दूसरे ग्रांट वाले विद्यालयों में होती है। जहां सभी विषय होते हैं। 

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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