निर्माण कार्यों में कंक्रीट की दरारें हमेशा से बड़ी चुनौती रही हैं, जिससे इमारतों, पुलों और सड़कों की मजबूती प्रभावित होती है। लेकिन अब इस समस्या का समाधान सामने आया है। इंदौर के एसजीएसआईटीएस के रिसर्च स्कॉलर प्रियंम चौहान ने एक ऐसी तकनीक पर शोध किया है, जिसमें कंक्रीट खुद अपनी दरारें भर लेता है। इस तकनीक को सेल्फ-हीलिंग सेल्फ-कम्पैक्टिंग कंक्रीट (SH-SCC) कहा जाता है, जो निर्माण क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।
इस तकनीक में बेसिलस सबटिलिस नाम के बैक्टीरिया का उपयोग किया जाता है। ये बैक्टीरिया कंक्रीट के अंदर निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं। जैसे ही कंक्रीट में दरार बनती है और उसमें पानी पहुंचता है, बैक्टीरिया सक्रिय हो जाते हैं और कैल्शियम कार्बोनेट बनाते हैं। यही पदार्थ दरारों को भर देता है, जिससे कंक्रीट फिर से मजबूत हो जाती है।
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इस तकनीक में सेल्फ-कम्पैक्टिंग कंक्रीट का इस्तेमाल किया जाता है, जो खुद ही फैलकर अपनी जगह पर जम जाता है। इसके लिए वाइब्रेशन की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे निर्माण प्रक्रिया आसान हो जाती है। इससे समय की बचत होती है और मजदूरी लागत भी कम होती है।
शोध के दौरान 0.2 मिमी से 0.5 मिमी तक की दरारों पर परीक्षण किया गया। 28 दिनों के भीतर 0.2 मिमी तक की दरारें पूरी तरह भर गईं, जबकि बड़ी दरारों में भी काफी सुधार देखा गया। इसके अलावा इस कंक्रीट की मजबूती सामान्य कंक्रीट से करीब 10 प्रतिशत अधिक पाई गई और पानी सोखने की क्षमता में 20 प्रतिशत तक कमी आई।