सीहोर में गांव की चौपाल बनी विज्ञान की पाठशाला, 1700 लोगों ने सीखा कचरे से कमाई और दूधी नदी बचाने का मंत्र
सीहोर। गांव की चौपाल पर जब विज्ञान रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा तो कचरा सिर्फ गंदगी नहीं, बल्कि कमाई का जरिया नजर आया और नदी सिर्फ पानी की धारा नहीं, बल्कि गांव के भविष्य की जीवनरेखा बनकर सामने आई। वैज्ञानिक डॉ. राजकुमार मालवीय के संयोजन में चलाए गए पांच दिवसीय प्रशिक्षण एवं जनजागरूकता अभियान ने ग्रामीणों को स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन, पुनर्चक्रण और जल संरक्षण के वैज्ञानिक तरीके समझाए। अभियान में करीब 1700 लोगों ने सहभागिता की।
घर-घर पहुंचा विज्ञान, हर परिवार को दिया जागरूकता का संदेश
अभियान के दौरान वॉलिंटियर्स ने हर घर पहुंचकर ग्रामीणों से संवाद किया। घरों पर स्टीकर लगाए गए, जिनमें हरित दूधी अभियान और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी जागरूकता की बातें दर्ज थीं। उद्देश्य साफ था कि स्वच्छता केवल सड़क या आंगन में झाड़ू लगाने तक सीमित न रहे, बल्कि इसकी शुरुआत घर के भीतर कचरे को सही तरीके से अलग करने से हो।
गीला-सूखा कचरा अलग करना बताया वैज्ञानिक प्रबंधन की पहली सीढ़ी
ग्रामीणों को बताया गया कि घरों से निकलने वाले गीले और सूखे कचरे को अलग करना बेहद जरूरी है। जैविक कचरे से कंपोस्ट तैयार किया जा सकता है, जबकि प्लास्टिक, कागज, धातु और अन्य पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग करके दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है। इससे गांवों में कचरे का बोझ घटने के साथ उपयोगी सामग्री और आय के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
दूधी नदी की सफाई नहीं, प्रदूषण रोकना बना अभियान का लक्ष्य
अभियान का सबसे भावनात्मक और महत्वपूर्ण संदेश दूधी नदी को बचाने का रहा। डॉ. मालवीय ने ग्रामीणों को समझाया कि नदी में कचरा पहुंचने के बाद सफाई करने से बेहतर है कि उसे जलस्रोत तक पहुंचने ही न दिया जाए। गांवों से निकलने वाले अपशिष्ट को व्यवस्थित तरीके से रोकना नदी, खेती और भूजल—तीनों की सुरक्षा के लिए जरूरी है।
जलस्रोत बचेंगे तो खेती और गांव का भविष्य सुरक्षित रहेगा
ग्रामीणों के साथ संवाद में जल संरक्षण को केवल पर्यावरण का विषय न मानकर खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़कर समझाया गया। नदी और जलस्रोत सुरक्षित रहने से भूजल स्तर, कृषि और आने वाली पीढ़ियों की जल जरूरतों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। अभियान ने लोगों को यह संदेश दिया कि नदी बचाने की शुरुआत किसी बड़े सरकारी प्रोजेक्ट से नहीं, बल्कि गांव के हर घर से हो सकती है।
जावर से शुरू हुआ अभियान, गांव-गांव पहुंचे वैज्ञानिक
पांच दिवसीय अभियान की शुरुआत 26 अगस्त को शासकीय उमावि जावर से हुई। इसके बाद 27 से 29 अगस्त तक पलासी, हाजीपुर और कुरावर में वैज्ञानिक संवाद आयोजित किए गए। विद्यार्थियों, युवाओं, ग्रामीणों और स्थानीय लोगों ने इन कार्यक्रमों में भाग लेकर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के व्यावहारिक उपयोग की जानकारी हासिल की।
मैनिट एल्युमिनाई और रिसर्च स्कॉलर्स ने बताए तकनीकी समाधान
कार्यक्रम में मैनिट एल्युमिनाई डॉ. मुकेश राठौर तथा रिसर्च स्कॉलर्स विराग, मयंक और अभिषेक ने भी ग्रामीणों से संवाद किया। उन्होंने पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भूमिका समझाई और स्थानीय संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के विभिन्न पहलुओं पर जानकारी साझा की।
ये भी पढ़ें: चिड़िया चुग गई खेत, युवा हनुमान बन गया है... लंका में आग लगा दी:इंदौर में उमंग सिंघार का भाजपा पर हमला
समिति के आयोजन में मिला विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद का मार्गदर्शन
अभियान का आयोजन मां हिंगलाज सेवा समिति ने किया। मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद, विज्ञान भवन भोपाल के मार्गदर्शन में अभियान को प्रायोजित किया गया। स्थानीय स्तर पर कर्मयोगी जनकल्याण केंद्र शाखा जावर ने सहयोग किया। आयोजन का उद्देश्य ग्रामीण समाज में वैज्ञानिक सोच को मजबूत करना और स्थानीय समस्याओं के स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक समाधान तलाशना रहा।
समापन पर प्रतिभागियों को दिए प्रमाण-पत्र
रविवार को अभियान के समापन अवसर पर प्राचार्य कमल सिंह विशिष्ट अतिथि रहे, जबकि सरपंच प्रतिनिधि एवं समाजसेवी राधेश्याम मंडलोई मुख्य अतिथि रहे। डॉ. राजकुमार मालवीय और अतिथियों ने अभियान में शामिल प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए। पांच दिनों तक चले संवाद और प्रशिक्षण के बाद ग्रामीणों के बीच स्वच्छता, पुनर्चक्रण और जल संरक्षण को लेकर जागरूकता का संदेश मजबूत हुआ।
ये भी पढ़ें: उज्जैन: महाकाल लोक में श्रद्धालुओं और महिला सुरक्षाकर्मी के बीच मारपीट, लोगों ने कराया बीच-बचाव
विज्ञान तभी सफल, जब वह व्यवहार में उतरे
अभियान के संरक्षक प्रो. डॉ. प्रशांत बारेदार ने कहा कि वैज्ञानिक सोच को जीवन का हिस्सा बनाना ही ऐसे अभियानों और प्रशिक्षणों का उद्देश्य है। कचरा प्रबंधन, पुनर्चक्रण और जलस्रोत संरक्षण जैसे विषयों पर ग्रामीणों की भागीदारी यह बताती है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित समाधान गांवों में भी प्रभावी बदलाव ला सकते हैं।






















